डूरी का सिद्धान्त (Drury's theory) - Emitra Tutorials

Wednesday, April 17, 2019

डूरी का सिद्धान्त (Drury's theory)

डूरी का सिद्धान्त (Drury's theory)

डूरी महोदय ने भी पुस्तक-चयन का सिद्धान्त सन् 1930 में प्रतिपादित किया । उनका सिद्धान्त है "उचित समय पर उचित पाठक को उचित पुस्तक प्रदान करना ।" (Right Book to the Right Readers at Right Time) उनके अनुसार उचित पुस्तक का अर्थ है वह पुस्तक जो पाठकों, काल व समुदाय को देखते हुए उचित हो । वह पुस्तक जिन पर अच्छी पुस्तक-समीक्षा प्रकाशित की गई हो तथा जिनका उपयोग पुस्तकालय में वांछित हो "उचित पुस्तक" है । सभी पुस्तकें प्रत्येक पुस्तकालय में उचित नहीं होती अत: पुस्तकालय की आवश्यकताओं के अनुरूप उचित पुस्तकों का ही चयन किया जाना चाहिए । "उचित पाठक' का अर्थ है पाठकों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर पुस्तक का चयन किया जाना | पाठकों रूचि व क्रिया-कलापों को ध्यान में रखकर पुस्तक-चयन किया जाना आवश्यक है । "उचित समय" का अभिप्राय है कि पुस्तक आवश्यकता होने पर शीघ्रातिशीघ्र प्रदान की जाय । उदाहरणार्थ - ग्रीष्मावकाश में कहानियां आदि उपलब्ध न कराने पर यदि परीक्षा समय पर प्रदान की जायगी तो वह उचित समय नहीं होगा । अत: यह आवश्यक है कि भविष्य में संभावित आवश्यकताओं को समझ कर पुस्तक-चयन किया जाये ।

3.3 रंगनाथन का सिद्धांत (Ranganathan's Principles)

डॉ. एस.आर. रंगनाथन ने अपनी पुस्तक में पुस्तक चयन की विवेचना पांच सूत्रों के आधार पर की है, जिसका सार-संक्षेप इस प्रकार है| 1 पुस्तकें उपयोग के लिये हैं (Books are for Use) पुस्तकों में लेखक के विचारों का संग्रह होता है । पुस्तकालय इन्हीं विचारों का आदान प्रदान है । अत: ऐसी पुस्तकों का चयन किया जाना चाहिये, जिनका अधिकतम उपयोग हो । स्पष्ट विचारों से युक्त सरल भाषा में लिखी पुस्तकों का चयन इस हेतु किया जाना चाहिए ।
2 प्रत्येक पाठक को उसकी पुस्तक मिले (Every reader his/her book) वितीय सूत्र के अनुसार पुस्तक-चयन पाठकों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए
ऐसी कोई पुस्तक न खरीदी जाय, जो कम पढ़ी जाय । इस हेतु पाठकों के सुझावों को पुस्तक चयन में महत्व दिया जाना चाहिए ।
3 प्रत्येक पुस्तक को उसका पाठक मिले (Every book its Reader) तृतीय सूत्र के अनुसार ऐसी पुस्तकें ही खरीदी जाएं, जिनको पढ़ने के लिये पाठक लालायित हो । यदि कोई पुस्तक पुस्तकालय में अनुपयोगी पड़ी रहे तो वह मृत- धन के समान है । इस हेतु पाठकों की रूचि, भाषा, स्तर आदि को ध्यान में रखकर पुस्तक-चयन किया जाना चाहिए । |
4 पाठकों का समय बचे (Save the time of Reader) चतुर्थ नियम के अनुसार पाठकों का बहुमूल्य समय व्यर्थ नहीं जाना चाहिए । अर्थात पुस्तक चयन करते समय ऐसी पुस्तकें खरीदनी चाहिए, जिससे कम से कम समय में अधिकतम जानकारी प्राप्त की जा सके । संदर्भ-पुस्तकें, विश्वकोश आदि का चयन इस हेतु अवश्य करना चाहिए । |
5 पुस्तकालय वर्धनशील संस्था है (Library is आ growing organism) पंचम सूत्र के दूरगामी प्रभावी पुस्तक चयन पर पड़ते है पुस्तक संख्या बढ़ने से अधिक स्थान व कर्मचारियों की आवश्यकता पड़ती है । अत: पुस्तकें अनुपयोगी न पड़ी रहें, वरन उनका उपयोग होता रहे । बेकार, कटी-फटी, पुराने संस्करण आदि पुस्तकों को पुस्तकालय से निकाल दें या अलग संग्रह करें | नवीन संस्करण तभी खरीदे जाय जब तक उनमें बहुत अधिक तथ्यपूर्ण व नवीन जानकारी न जोड़ी गई हो । पाठ्य-पुस्तकों को छोड़कर अन्य पुस्तकों की अधिक प्रतियां बहुत आवश्यकता पड़ने पर ही खरीदी जायें ।

3.4 मांग-पूर्ति का सिद्धांत (Demand-Supply Theory)

एल.आर. मैकॉल्विन ने अत्यंत महत्वपूर्ण मांग-पूर्ति का सिद्धांत पुस्तक चयन हेतु प्रतिपादित किया है । उनके अनुसार जब तक पुस्तकें उपयोगी सिद्ध न हों, उनका महत्व एक छपे हुए कागज से ज्यादा कुछ नहीं है । पुस्तकों की उपयोगिता उनकी मांग पर निर्भर करती है।
अर्थशास्त्र का मांग-पूर्ति के सिद्धांत पर वस्तु का मूल्य निर्धारित होता है । पुस्तकालय में मांग-पूर्ति का सिद्धांत पुस्तक की उपयोगिता पर आधारित होता है एवं उसी के आधार पर चयन किया जाना चाहिए ।
अधिक उपयोगी पुस्तक | - अधिक मांग | - अधिक चयन कम उपयोगी पुस्तक | - कम मांग
- कम चयन अनुपयोगी पुस्तक - न्यून मांग
- चयन नहीं पुस्तकों का अधिक मूल्य होने पर भी पूर्ति में बाधा उत्पन्न होती है । यह जरूरी नहीं कि मूल्यवान पुस्तक अधिक उपयोगी होगी | एक से स्तर की दो पुस्तकों का चयन मूल्य पर आधारित होता है | इस सिद्धांत में मांग की पूर्ति पर अधिक बल दिया गया है । अनेकों बार इस मांग तथा पूर्ति में सामंजस्य भी एक समस्या उत्पन्न करती है उदाहरणार्थ- कुंजी आदि की या एक सस्ते उपन्यास की मांग तो बहुत अधिक होती है, परंतु स्तर न्यून होता है । अत: इसकी पूर्ति नहीं की जा सकती । प्राय: यह देखा गया है कि कुछ वर्ग-विशेष की मांग निम्नस्तरीय पुस्तकों की अधिकाधिक हो सकती है । अत: इस सिद्धांत के पालन में पुस्तकालय के स्तर में गिरावट नहीं आने देना चाहिए ।
इस सिद्धान्त को निम्नलिखित तीन स्तंभों पर आधारित किया गया है -
1 घनत्व (volume) : मांग की अधिकता अथवा न्यूनता को घनत्व कहा गया है । जितनी अधिक मांग होगी पुस्तक चयन उतना ही आवश्यक होगा । अत: पुस्तक जिसकी बहुत अधिक पाठकों द्वारा मांग की जाय, आवश्यक रूप से खरीदी जाय । |
2 मूल्य (Value) : यहां मूल्य का अर्थ गुणात्मक मूल्य से है । पुस्तक द्वारा प्रदान किये गये शान, सूचना वृद्धि, रचना शक्ति, प्रोत्साहन तथा उत्साह पुस्तक के गुणात्मक मूल्य है।
जितने अधिक गुण पुस्तक में होंगे, उतनी ही उसकी अधिक मांगें होंगी । अत: गुणात्मक रूप से मूल्यवान पुस्तकों का चयन अवश्य किया जाना चाहिए ।
3 विविधता (Variety) : विविधता पाठकों की भिन्नता के कारण उत्पन्न होती है । सभी पाठक एक सी आदतों मानसिकता, बुद्धि तथा शैक्षिक योग्यता वाले नहीं होते, अत: उनकी मांग भी अलग-अलग होती है । सभी प्रकार के पाठकों की मांग की पूर्ति करने का प्रयास अवश्यक करना चाहिए ।

4 चयनकर्ता के कार्य (Functions of the book selectors)

पुस्तक- चयन के उपरोक्त कारकों एवं सिद्धांतों की पूर्ति हेतु पुस्तक- चयनकर्ता के निम्नलिखित कार्य है:
1. अपनी विद्वता का परिचय देते हुए सर्वोत्तम एवं उपयोगी पुस्तकों की पहचान करें ।
2. चयनकर्ता अपने आपको पुराने व नये लेखकों के विचारों से अवगत रखे एवं उनका अध्ययन कर पुस्तकों का चयन करे । 

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