सार्वजनिक पुस्तकालय जन विश्वविदयालय (Peoples University) - Emitra Tutorials

Thursday, January 3, 2019

सार्वजनिक पुस्तकालय जन विश्वविदयालय (Peoples University)

सार्वजनिक पुस्तकालय जन विश्वविदयालय (Peoples University) 

5. सार्वजनिक पुस्तकालय को समाज के सभी वर्गों के व्यक्तियों को निष्पक्ष एव निबंध
रूप से उनकी वांछित रख रुचि की अध्ययन सामग्री का उपयोग करने का अवसर प्रदान करना चाहिए।
भारत सरकार द्वारा संस्थापित पुस्तकालय परामर्शदात्री समिति (Advisory Committee for Libraries) ने सभी सार्वजनिक
पुस्तकालय की निम्नलिखित प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख किया है - 1. जो अधिकांशत: लोग-निधि (Pubic Fund) से संचालित होता है; 2. जो पाठकों से कोई शुल्क प्राप्त नहीं करता फिर भी बिना जाति, मत अथवा लिंग भेद
के समस्त जनता के उपयोग हेतु खुला रहता है; ।
3. जो स्व सहायक शैक्षणिक संस्था के रूप में अभिप्रेत रहता है और स्वशिक्षा का | अपरिमित साधन बनता है;
था
 4. जो अध्ययन सामग्री को संग्रहीत रखते हुए निर्बाध रूप से बिना पक्षपात अथवा
अपकृति के इतने अधिक विभिन्न विषयों पर, जो पाठकों की रुचियों को सन्तुष्ट कर, विश्वसनीय सूचना प्रदान करता है।
इस परिभाषा में सार्वजनिक पुस्तकालय को सहायक शैक्षणिक संस्था कहा गया है। इसके अतिरिक्त सार्वजनिक पुस्तकालय जन विश्वविदयालय (Peoples University) भी है, जो समाज के सभी वर्गों के व्यक्तियों को समान रूप से आजीवन स्वशिक्षा का अवसर प्रदान करता है।
सी.जी. विश्वनाथन के अनुसार "सार्वजनिक पुस्तकालय अपने क्षेत्र के सभी नागरिकों को बिना रंग,जाति व अन्य किसी भेदभाव के नि:शुल्क पुस्तकालय सेवा प्रदान करते हैं तथा इनका प्रबन्ध स्थानीय प्रशासन द्वारा पूर्णत: अथवा अधिकांशत: अपने ही व्यय से होता है व पुस्तकालय का संचालन प्रशासन द्वारा नियुक्त प्राधिकारी अथवा समिति द्वारा होता है।
"यूनेस्को (Unesco) के सार्वजनिक पुस्तकालयों के मेनीफेस्टों के अनुसार सार्वजनिक पुस्तकालय वे पुस्तकालय हैं
1. जो निश्चित अधिनियम द्वारा स्थापित हो;
2. जिनका संचालन पूर्ण रूप से जनता के धन द्वारा हो;
3. जिसकी सेवाओं के लिए कोई सीधा शुल्क न लिया जाता हो; एवं
4. जो पूर्ण रूप से निःशुल्क व समान रूप से समुदाय के लिए उपलब्ध हो।
उपर्युक्त सभी परिभाषाओं के मनन के पश्चात् हम कह सकते हैं कि सार्वजनिक पुस्तकालय वह जन कल्याणकारी सामाजिक संस्था है, जो समाज के सभी वर्गों के व्यक्तियों को समान रूप से नि:शुल्क पुस्तकालय सेवा प्रदान करती है, तथा जिसका वित्तीय भार स्थानीय अथवा सम्बन्धित प्रशासन द्वारा वहन किया जाता है।

3. सार्वजनिक पुस्तकालय की आवश्यकता

वर्तमान प्रजातंत्र में प्रत्येक नागरिक का शिक्षित होना आवश्यक है, जिससे वह अपने अधिकारों के प्रति सजग एवं जागरूक रहे और देश व समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर सके। विश्व में पुस्तकों को शिक्षा का एक महत्वपूर्ण माध्यम माना गया है, जिनका अध्ययन कर, समझकर व्यक्ति अपने ज्ञान में वृद्धि करता है। किसी भी क्षेत्र की अर्वाचीन व नवीनतम जानकारी प्राप्त कर सकता है, समय का सदुपयोग कर मनोरंजन प्राप्त करता है एवं सर्वांगीण विकास की दिशा में अग्रसर होता है। साथ ही पुस्तकें एक अच्छी मित्र, दार्शनिक एव निर्देशक के समान हैं जिनका अध्ययन मनन कर जीवन पर्यन्त स्वशिक्षा ग्रहण की जा सकती है। समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपनी वांछित पुस्तकें न तो क्रय कर सकता है और न ही किसी अन्य स्त्रोत से प्राप्त कर सकता है। अत : समाज के सभी व्यक्तियों की जान, सूचना एवं मनोरंजन सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति पुस्तकों के माध्यम से करने के लिए सार्वजनिक पुस्तकालयों का होना आवश्यक है।
यह सम्भव है कि समाज के सम्पन्न व्यक्ति अपनी आवश्यकता की बहुत सी वांछित पुस्तकें स्वयं क्रय कर लें; परन्तु निम्न एवं मध्यम वर्ग के व्यक्ति, जिनकी संख्या समाज में अधिक है, स्वयं पुस्तकें क्रय करने में असमर्थ हैं। अत : समाज के बहुत बड़े भाग के लिए सार्वजनिक पुस्तकालय नितान्त आवश्यक है।
। यही नहीं कि केवल साक्षर एवं स्वस्थ व्यक्ति ही सार्वजनिक पुस्तकालयों का उपयोग कर लाभान्वित हो सकते हैं अपितु निरक्षर एवं शारीरिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति भी पुस्तकालय से लाभ प्राप्त कर सकते हैं। आधुनिक पुस्तकालयों में दृश्य श्रव्य साधनों यथा-चलचित्र, फिल्म स्ट्रिप्स, चित्र, रेडियो, टेलिविजन, कम्पयूटर एवं टेप रिकार्डर आदि के उपयोग से निरक्षर एवं विकलांग जैसे अंधे व बहरे (Physically handicapped like blind and deaf) भी स्वशिक्षा प्राप्त कर लाभान्वित हो सकते हैं और देश के अच्छे नागरिक बन सकते हैं। अच्छी पुस्तकों का साक्षरों द्वारा निरक्षरों के सम्मुख वाचन कर उन्हें लाभ पहुंचाया जा सकता है एवं निरक्षरों को साक्षर बनने की प्रेरणा प्रदान कर पुस्तकालय प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम को प्रभावी ढंग से कार्यान्वित करने में यह सम्पूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
सार्वजनिक पुस्तकालय समाज के सभी वर्गों के व्यक्तियों को आजीवन स्वशिक्षा प्राप्त करने का समान रूप से अवसर सुलभ करता है। इसलिये इसे 'लोक विश्वविद्यालय' की संज्ञा दी गयी है।
| शैक्षणिक एवं विशिष्ट पुस्तकालयों का क्षेत्र सीमित होता है। शैक्षणिक पुस्तकालय जहाँ सम्बन्धित शिक्षण संस्था में अध्ययनरत छात्रों व कार्यरत अध्यापकों को पुस्तकालय सेवायें प्रदान करते हैं वहीं विशिष्ट पुस्तकालय सम्बन्धित संस्था के अधीन कार्यरत शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों एवं अन्य कर्मचारियों को पुस्तकालय सेवायें प्रदान करते हैं; परन्तु सार्वजनिक पुस्तकालय का क्षेत्र व्यापक है । यह समाज के सभी वर्गों के व्यक्तियों को बिना किसी भेदभाव के नि:शुल्क पुस्तकालय सेवायें उपलब्ध करते हैं। अत: ऐसी जन कल्याणकारी संस्था समाज के सर्वांगीण विकास के लिए अत्यन्त आवश्यक है।

4. सार्वजनिक पुस्तकालय के उद्देश्य

सार्वजनिक पुस्तकालय एक जन कल्याणकारी संस्था है जो समाज के सभी वर्गों के व्यक्तियों के सर्वांगीण विकास एवं कल्याण हेतु आजीवन, अनवरत स्वशिक्षा, सूचना, ज्ञानवर्द्धन एवं मनोरंजन प्रदान करती है। इन्हीं बातों को ध्यान में रख डॉ. रंगनाथन ने अपनी पुस्तक "लाइब्रेरी मैनुअल" (Library Manual) में सार्वजनिक पुस्तकालय के निम्नलिखित उद्देश्य बताये हैं
1. समाज के सभी वर्गों के व्यक्तियों के लिए आजीवन स्वशिक्षा प्राप्त करने में सहायक होना।
2. समाज के सभी वर्गों के व्यक्तियों को समस्त विषयों एवं क्षेत्रों पर अद्यतन (Upto | date) तथ्य एवं सूचनाएँ प्रदान करना।
3. स्थानीय, राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय, राजनैतिक कार्यों के सम्पादन में व्यस्त व्यक्तियों को सभी मतों पर मुद्रित पाठ्य सामग्री बिना किसी भेदभाव के भलीभांति प्रदान करना।
4. राष्ट्रीय उत्पादकता वृद्धि हेतु उद्योगों के वरिष्ठतम अधिकारियों को उनके सम्बन्धित
क्षेत्रों में नवीनतम विकास की सूचना प्रदान करना तथा उनमें कार्यरत वैज्ञानिकों, अभियांत्रिकों, अनुसंधानकर्ताओं एवं तकनीशियनों को प्रत्येक नवीन सूचना के उपयोग
हेतु प्रेरित करना।
5. समाज के सभी वर्गों को उनके अवकाश के समय (Leisure time) के सदुपयोग में सहायता करना तथा पुस्तकालय के उपयोग हेतु प्रेरित करना। 

No comments:

Post a Comment