विश्वविद्यालय पुस्तकालय का महत्व और परिणाम - Emitra Tutorials

Thursday, January 3, 2019

विश्वविद्यालय पुस्तकालय का महत्व और परिणाम

विश्वविद्यालय पुस्तकालय का महत्व और परिणाम

(iv) प्रकाशन
विश्वविद्यालय शोध परिणामों को प्रकाशित कर शोध कार्यों को प्रोत्साहित करता है और इसे सार्वजनिक उपयोग के लिए उपलब्ध करता है। इस प्रकाशन कार्य में विश्वविद्यालय को पुस्तकालय प्रदान करता है।
पुस्तकालय इस दिन में उपयोग हेतु विदाक्य उन
(v) विस्तार सेवा
विश्वविद्यालय अपने विस्तार सेवा के द्वारा समाज के स्तर को ऊँचा उठाने कार्य करता है। विश्वविद्यालय दारा प्रदान की जाने वाली विस्तार सेवाओं मंर अधोलिखित निम्न है :
n पत्राचार पाठ्यक्रम n प्रौढ शिक्षा का आयोजन n पुनश्चर्या पाठ्यक्रम, |n प्रसार व्याख्यान, तथा | n माँग के अनुसार अन्य संस्था एवं संगठनों को मार्गदर्शन करना।
पुस्तकालय विश्वविद्यालय को उपरोक्त विस्तार सेवाओं को सफलता पूर्वक संचालन हेतु संबद्ध लोगों को अपेक्षित प्रलेख सूची, ग्रन्थ और अन्य सूचनायें प्रदान करता है।
(vi) सैद्धांतिक तथ्यों को व्यावहारिकता का रूप प्रदान करने के लिए विश्वविद्यालय उन तथ्यों का वर्णन करता है। शोध परिणामों को व्यावहारिक जीवन में उपयोग हेतु विश्वविद्यालय उसकी व्याख्या और विस्तार करता है। पुस्तकालय इस कार्य में विश्वविद्यालय को सहयोग प्रदान करता है।

3.3.2. विश्वविद्यालय पुस्तकालय के कार्य

विश्वविद्यालय पुस्तकालय का प्रमुख कार्य विश्वविद्यालय के कार्यों में सहयोग प्रदान करना होता है। उपरोक्त वर्णित विश्वविद्यालय के सभी कार्यों के सम्पादन में पुस्तकालय प्रमुख भूमिका निभाते है। विश्वविद्यालय पुस्तकालय के मुख्य शैक्षणिक कार्य निम्नलिखित हैं : -
(i) नवीन छात्रों के लिए प्रारंभिक परिचय का कार्यक्रम आयोजित करना, (ii) छात्रों में अध्ययन की प्रवृति को बढ़ाने के लिए विविध उपाय करना, (iii) पाठकों की समस्याओं के समाधान हेतु आवश्यक मार्गदर्शन और सूचना सेवा की।
व्यवस्था करना, (iv) शोध कार्य के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु प्रलेखन संबन्धी विविध कार्य करना, (V) विस्तार सेवाओं का आयोजन करना, और (vi) पाठ्य-सामग्री का अर्जन तथा प्रस्तुतिकरण करना जैसे ग्रन्थ चयन, वर्गीकरण, सूचीकरण आदि ।
कोठारी शिक्षा आयोग ने विश्वविद्यालय पुस्तकालय के निम्नलिखित कार्य बताये है:
(i) शिक्षण संस्थाओं में पढ़ाये जाने वाले विभिन्न विषयों के विभागाध्यक्षों के सहयोग से पुस्तकालय के विकास के लिए समन्वित कार्यक्रम बनाना जिससे उसका सही उपयोग हो सके,
(ii) केन्द्रीय पुस्तकालय के विभागीय पुस्तकालय तथा अध्ययन गोष्ठी पुस्तकालयों
(Seminar Libraries) के मध्य सम्पर्क सूत्र का कार्य करना तथा शोधार्थियों को
यथेष्ट सहायता देना,
(i) विश्वविद्यालय द्वारा विशेष अध्ययन के लिए चुने गये अथवा क्षेत्रीय महत्व के विषयों
में शोधकार्य करने के लिए आवश्यक साधन तथा सुविधाएँ प्रदान करना,
(iv) पुस्तकालय में ऐसा साहित्य संग्रहित करना जिसका उपयोग शैक्षणिक कार्यक्रमों तथा प्रयोगशालीय शोध में किया जा सके। ऐसे साहित्य के द्वारा ही प्राध्यापकों तथा छात्रों की पुस्तकालय आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सके,
(V) विश्वविद्यालयों से सम्बन्ध प्राध्यापकों को सम्बन्धित विषय क्षेत्रों में हुए विकास के
सम्बन्ध में सूचित करना,
(vi) विश्वविद्यालय द्वारा चुन गये विशिष्ट अध्ययन-क्षेत्रों के अतिरिक्त अन्य विषयों पर सामग्री एकत्रित करना 'एवं
(i) पुस्तकों, एवं विद्वानों को एक दूसरे के निकट लाना तथा ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करना जिनसे बौद्धिक जिज्ञासा उत्तेजित हो, अन्वेषण की प्रवृति जागृत हो तथा अध्ययन उत्साहवर्द्धक हो।

3.3.3. विश्वविद्यालय पुस्तकालय में सेवायें

उपरोक्त कार्यों के साथ-साथ विश्वविद्यालय पुस्तकालय अपने पाठकों को कुछ सेवायें प्रदान करता है। एक विश्वविद्यालय द्वारा निम्नांकित सेवायें प्रदान की जानी चाहिए:
(i) पुस्तकालय दीक्षा सेवा (ii) पुस्तक खोजने के लिए सूची का उपयोग विधि समझाना, (ii) पुस्तक लेन-देन सेवा, (iv) सामान्य तथा विशिष्ट सूचनाएँ प्रदान करना, (V) साहित्य खोज, (vi) पाठक परामर्शदात्री सेवा एवं संदर्भ सेवा, (vii) सामयिक अभिग्यता सेवा (viii) पुस्तकों का आरक्षण, (ix) अन्तरा-पुस्तकालयीन आदान (x) पुस्तक सन्दर्भ सूची तथा अध्ययन सूचियाँ का संकलन (xi) अनुक्रमणीकरण एवं सारकरण सेवायें, (xii) छाया प्रतिलिपिकरण सेवा (xiii) अनुवाद सेवा, (xiv) वार्टीकल फाइल का अनुरक्षण, (xv) नवागत पुस्तकों के आवरण का प्रदर्शन तथा नवागत पुस्तकों की सूचियों का प्रसारण, एवं
(xvi) पाठ्य सामग्री का प्रदर्शन।
उपरोक्त सेवाओं को दृष्टिगत रखते हुए आकार तथा साधनों के अनुरूप किसी विश्वविद्यालयीन पुस्तकालय में विभागों की स्थापना की जा सकती है। साधारणतया एक विश्वविद्यालय पुस्तकालय में निम्नलिखित विभाग तथा विभागाध्यक्ष होते है : |
(i) ग्रन्थ अर्जन विभाग,
(ii) ग्रन्थ प्रस्तुतीकरण विभाग, (iii) ग्रन्थ अनुरक्षण विभाग, (iv) संदर्भ सेवा विभाग (V) ग्रन्थ परिसंचरण (Circulation) विभाग, (vi) सामयिक प्रकाशन विभाग, (vii) ग्रन्थ-सन्दर्भ-सूची (Bibliography) विभाग, (viii) पाण्डुलिपियाँ विभाग (ix) प्रलेखन - अनुक्रमणीकरण, सारकरण आदि सेवायें, (x) अणु ग्रन्थ विभाग - माइक्रोफिल्मस, माइक्रोफिश आदि,
(xi) कार्यालय ।।

3.3.4. विश्वविद्यालय पुस्तकालय का संगठनात्मक ढाँचा

विश्वविद्यालयों में निम्नलिखित दो प्रकार के पुस्तकालय होते है :
1. केन्द्रीय पुस्तकालय और 2. विभागीय पुस्तकालय
उपरोक्त दोनों प्रकार के पुस्तकालय के कार्यों को व्यवस्थित रूप से सम्पन्न, उनमें ताल-मेल बनाये रखने और उनके माध्यम से अपने दायित्वों को पूरा करने के लिए इनका संगठन निम्नांकित पद्धतियों में से किसी एक के आधार पर किया जाता है। |

(i) विकेन्द्रीयकरण पद्धति

इस पद्धति के अनुसार केन्द्रीय पुस्तकालय और विभागीय पुस्तकालयों का संगठन और प्रबंध स्वतन्त्र रूप से किया जाता है। (i) आंशिक केन्द्रीयकरण पद्धति
इस पद्धति के अनुसार विभागीय पुस्तकालयों का संगठन और प्रबंध केन्द्रीय पुस्तकालय के निर्देशन और नियंत्रण में किया जाता है। परन्तु कुछ मुख्य विभागों अथवा संघटक महाविद्यालयों में जैसे, चिकित्सा विधि, यांत्रिकी आदि विभागों में स्वतंत्र पुस्तकालय रहते है। उनका संगठन और प्रबंध संबद्ध प्राचार्य या विभागाध्यक्ष के निर्देशन में किया जाता है।
(iii) विश्वविद्यालय व्यापी संगठन पद्धति
| इस पद्धति में विश्वविद्यालय से संबद्ध सभी पुस्तकालयों का संगठन और प्रबंध मुख्य पुस्तकालयाध्यक्ष के निर्देशन एवं नियन्त्रण में किया जाता है। पुस्तकालय को प्रभावपूर्ण ढ़ग से कार्य करने की दृष्टि वर्तमान में यह पद्धति अधिक मान्य है।

3.3.5. विश्वविद्यालय पुस्तकालय के कर्मचारी

किसी भी पुस्तकालय की सफलता उसके कर्मचारी के ऊपर निर्भर करती है। अत: विश्वविद्यालय पुस्तकालय को योग्य, प्रशिक्षित व कर्मठ कर्मचारियों का ही चयन करना चाहिए। किस पद के लिए क्या योग्यता होनी चाहिए और कौन से पद की संख्या कितनी होनी चाहिए, इसके लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा मानदण्ड निर्धारित किया गया है।
विश्वविद्यालय पुस्तकालय को कर्मचारियों का चयन और उसका संख्या निर्धारित करते समय इस मानदण्ड को उपयोग में लाना चाहिए।

3.3.6. विश्वविद्यालय पुस्तकालय का प्रशासन

विश्वविद्यालय पुस्तकालय का प्रबंध निम्न निकायों और पदाधिकारियों दवारा किया जाता है।
(i) व्यवस्थापिका सभा : यह सभा पुस्तकालय की व्यवस्था पर सामान्य नियन्त्रण रखती
(ii) विद्वत परिषद : यह परिषद पुस्तकालय की व्यवस्था के लिए पुस्तकालय समिति का
निर्माण करती है। (iii) कार्यकारिणी परिषद : यह परिषद पुस्तकालय समिति द्वारा लिये गये निर्णय विचार
करती है और उन्हें स्वीकृत करती है। (iv) पुस्तकालय समिति : पुस्तकालय समिति पुस्तकालय के लिए उचित और आवश्यक नीति और कार्यक्रम निर्धारित करती है।

No comments:

Post a Comment