शैक्षणिक पुस्तकालय की परिभाषा, स्वरूप एवं प्रकार से परिचित होना - Emitra Tutorials

Thursday, January 3, 2019

शैक्षणिक पुस्तकालय की परिभाषा, स्वरूप एवं प्रकार से परिचित होना

शैक्षणिक पुस्तकालय की परिभाषा, स्वरूप एवं प्रकार से परिचित होना

3.3.6. प्रशासन 4. सारांश 5. अभ्यासार्थ प्रश्न 6. विस्तृत अध्ययनार्थ ग्रन्थसूची
1. विषय प्रवेशशिक्षा सीखने की एक प्रक्रिया है, जो मानव को हर स्तर पर समार्थवान बनाती है। इस प्रक्रिया में विदयालय, महाविदयालय और विश्वविदयालय अहम भूमिका निभाते है। किसी शिक्षण संस्था को अपने उद्देश्य की प्राप्ति में उस शिक्षण संस्था की पुस्तकालय की अहम भूमिका होती है। शिक्षण संस्थाओं में पुस्तकालय के महत्व को देखते हुए डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग (1948-49) के प्रतिवेदन में पुस्तकालय को किसी भी शिक्षण संस्था के हृदय के रूप में बताया है। प्रस्तुत इकाई में विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय पुस्तकालय की विस्तार से चर्चा की गई है।

2. परिभाषा और स्वरूप

शिक्षण संस्थाओं से संलग्न पुस्तकालय को शैक्षणिक पुस्तकालय कहा जाता है। शिक्षण संस्थान शिक्षा और शोध के ऐसे संस्थान है जो किसी निर्धारित पाठ्यक्रम के आधार पर किसी निश्चित स्तर, उपाधि या प्रमाण पत्र की प्राप्ति के लिए छात्रों को औपचारिक शिक्षा प्रदान करते है। विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय और इंजीनियरिंग चिकित्सा आदि की शिक्षा से संबंधित संस्थान ऐसे ही संस्थान है। अपने संस्थान की शैक्षणिक आवश्यकताओं में सहयोग देने के लिए हर शिक्षण संस्थाओं में पुस्तकालय की स्थापना की जाती है। इस प्रकार अपनी संस्था के 'अनुरूप आकार' प्रकार, संग्रह तथा सेवाएं प्रदान करने आदि में शैक्षणिक पुस्तकालय एक दूसरे से भिन्न हो सकते है। परन्तु साथ ही साथ हर शैक्षणिक पुस्तकालय में कुछ सामान्य तत्व भी होते है। वह तत्व यह है कि प्रत्येक शैक्षणिक पुस्तकालय अपने संस्थान की शिक्षा तथा शोध की आवश्यकताओं को पूरा करने में पूर्ण सहयोग प्रदान करना है।

3. शैक्षणिक पुस्तकालय के प्रकार

शैक्षणिक पुस्तकालय के प्रकारों को निम्न तालिका द्वारा त्यक्त किया जा सकता है।
शैक्षणिक पुस्तकालय (Academic Libraries)
1 विद्यालय पुस्तकालय (School Libraries)
2. महाविद्यालय पुस्तकालय
(College Libraries)
3. विश्वविद्यालय पुस्तकालय
(University Libraries)
(i) प्राथमिक विद्यालय पुस्तकालय (i) स्नातकपूर्व महाविद्यालय पुस्तकालय (ii) माध्यमिक विद्यालय पुस्तकालय (i) स्नातकोत्तर महाविद्यालय पुस्तकालय (iii) उच्चतर माध्यमिक विद्यालय (iii) तकनीकी महाविद्यालय पुस्तकालय पुस्तकालय (कृषि, यान्त्रिकी महाविद्यालय पुस्तकालय, आदि) (iv) चिकित्सा महाविद्यालय पुस्तकालय, तथा (v) प्रशिक्षण महाविद्यालय पुस्तकालय
3.1. विद्यालय पुस्तकालय । विद्यालय वह संस्था होती है जहाँ से छात्र-छात्रायें शिक्षा जगत में प्रवेश करते है। यह कार्य निम्न तीन स्तरों से पूरा होता है।
(i) प्राथमिक विद्यालय (ii) माध्यमिक विद्यालय (iii) उच्चतर माध्यमिक विद्यालय
विद्यालय के इस प्रत्येक स्तर पर अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए पुस्तकालय का होना आवश्यक है। छात्रों की शैक्षणिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु विद्यालय अधिकारी अनेक सुविधा प्रदान करते है। इनमें सर्वाधिक प्रचलित पुस्तकालय सुविधा है। पुस्तकालय छात्र व अध्यापक दोनों की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। पुस्तकालय छात्रों के शैक्षणिक व अशैक्षणिक दोनों क्षेत्रों में प्रतिभा का विकास करता है। विद्यालय पुस्तकालय वास्तव में विद्यालय का वितीय अध्ययन कक्ष (Second class room) होता है। पुस्तकालय विद्यार्थियों में मौलिक चिन्तन की प्रवृति विकसित करने, अपनी शक्तियों का राष्ट्र के निर्माण में उपयोग करने, उच्च आदर्श को अपनाने, एवं भावी जीवन का निर्माण करने में सहायक होते

3.1.1. लक्ष्य एवं उद्देश्य

। विद्यालय छात्रों के व्यक्ति व के विकास में सहायता करता है। विद्यालय के माध्यम से छात्र समाज और राष्ट्र से परिचित होने लगते है और समझने लगते है कि सबके विकास या कल्याण का आधार मानवता है। कर्तव्य पालन, सहयोग और प्रेम के व्यवहार से इस मानवता का दर्शन होता हैं अत: बच्चों में कक्षा शिक्षा तथा पुस्तकालय शिक्षा के माध्यम से इन तीनों गुणों को बढ़ाया जाता है। कक्षा में शिक्षण और पुस्तकालय में अपने अध्ययन तथा अनुभव से बने इन गुणों से वे अवगत होते है। छात्र-छात्रायें कक्षा में बतलाई हुई बातों की सच्चाई वे पुस्तकालय में अध्ययन से उदाहरणों के साथ समझते है। आदर्श को यथार्थ में समझने के लिए
पुस्तकालय शिक्षा अति आवश्यक है। निम्नांकित उद्देश्यों को विद्यालय शिक्षा और पुस्तकालय दोनों मिलकर पूरा करते है।
(i) बाल छात्रों को साक्षर करना। (i) उनमें सुप्त बौद्धिक शक्तियों को जागृत और विकसित करना, (iii) उनके चरित्र का निर्माण करना। (iv) मौलिक विषयों से छात्र-छात्राओं को परिचित करना, (v) शिक्षार्थियों में अध्ययन की प्रवृति को बढ़ाना, (vi) मौलिक रूप से विचार करने हेतु उनके वैचारिक क्षेत्र को विस्तृत करना, तथा
(vii) बाल विद्यार्थियों में सामान्य ज्ञान, अच्छे विचार और रुचि का विकास करना। निम्नलिखित उद्देश्यों को प्राप्त करने का दायित्व विशेषरूप से विद्यालय पुस्तकालय पर होता
(i) सचित्र और उदाहरणों से पूर्ण आधार सामग्री उपलब्ध कर अध्यापन कला को विकसित
करना,
(i) पाठकों को पुस्तकालय की शिक्षा देना अर्थात प्रयोगशाला के रूप में पुस्तकालय का
और साधन के रूप में पुस्तकों का उपयोग कैसे करना, इसकी शिक्षा देना, (ii) कक्षा-शिक्षा को विकसित करना, (iv) विविध प्रसंगों पर आवश्यक सन्दर्भो को खोजने की शिक्षा देना, (v) सूचनाप्रद और आवश्यक अध्ययन के प्रति रूचि बढ़ाना, (vi) विविध विषयों से परिचित होने के लिए अवसर उपलब्ध करना, (vii) किशोर युवक-युवतियों को विविध प्रकार के पुस्तकालय और वहाँ उपलब्ध विशाल
साहित्य से अवगत करना, और (viii) बाल छात्र-छात्राओं को महाविद्यालयीन शिक्षा के माध्यम से ज्ञान के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए योग्य बनाना।

3.1.2. विद्यालय पुस्तकालय के कार्य 

विद्यालय पुस्तकालय के निम्न कार्य है। (i) पाठ्य सामग्री का संकलन, संग्रह और उनका संगठन करना :- उपरोक्त तीनों प्रकार के
विद्यालय को अपने छात्रों के शैक्षणिक स्तर के अनुसार पाठ्य सामग्री का चयन करना होता है। बाल पाठकों की सर्वाधिक रूचि कहानी चित्रमय ऐतिहासिक कथा, हास्य रचना एवं आश्चर्य और अद्भुत कार्यपरक ग्रन्थों में रहती है। विद्यालय पुस्तकालय को इस
प्रकार के साहित्य की विशेष व्यवस्था करनी होती है। (ii) पुस्तकालय का प्रारंभिक परिचय प्रदान करना :- नये छात्रों को पुस्तकालय के विविध
विषयों से अवगत करना और पुस्तकालय का अच्छी तरह से उपयोग करने के लिए
पुस्तकालय शिक्षा देने की व्यवस्था करना। (iii) पुस्तकालय कक्षा अवधि में अध्ययन करने वाले छात्रों को व्यक्तिगत रूप से मार्गदर्शन
प्रदान करने की पूरी व्यवस्था करना।
(iv) बाल-छात्रों को मनोरंजन के साथ शिक्षा और सूचना की बाते बतलाने के लिए आवश्यक
उपाय करना। (V) मानचित्र, चार्ट, नवीन पुस्तक और पत्र-पत्रिकाओं को आकर्षक ढंग से प्रदर्शित करना, (vi) पाठकों को घर ले जाने के लिए पुस्तकें देना। (vii) शिक्षकों को अपना अध्ययन कार्य अच्छी तरह करने के लिए आवश्यक सहयोग प्रदान
करना। (viii) कहानी समय, पुस्तक बातचीत, वादविवाद, लेख प्रतियोगिताओं का आयोजन करना
जिससे विद्यार्थियों में नई बाते सीखने तथा अपनी बातों को कहने का अवसर प्राप्त
हो। उससे उनके व्यक्तित्व का विकास होता है। 

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