सार्वजनिक पुस्तकालय के उद्देश्य - Emitra Tutorials

Thursday, January 3, 2019

सार्वजनिक पुस्तकालय के उद्देश्य

सार्वजनिक पुस्तकालय के उद्देश्य

6. प्राचीन एवं वर्तमान साहित्य को भावी पीढ़ी के उपयोग हेतु सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संरक्षित रखना एवं समाज के सभी व्यक्तियों को शोध एवं उपयोग के लिए उपलब्ध कराना। |
7. मुद्रित ज्ञान की संरक्षित संस्था के रूप में समाज के ज्ञान की अभिवृद्धि में निरन्तर प्रयत्नशील रहना।
सार्वजनिक पुस्तकालय का प्रमुख उद्देश्य समाज के सभी वर्गों के व्यक्तियों की अभिरुचि को ध्यान में रखते हुए उचित अध्ययन सामग्री संग्रहीत कर व्यक्तियों को उपलब्ध कराना है।
यूनेस्को के अनुसार सार्वजनिक पुस्तकालय के उद्देश्य जो ऊपर दिये गये उद्देश्यों से मिलते-जुलते हैं, निम्न प्रकार हैं
1. पुस्तकें, पत्र-पत्रिकायें, समाचार पत्र, मानचित्र, संगीत रिकार्डस आदि अध्ययन सामग्री का पाठकों की आवश्यकता एवं मांग के अनुसार संग्रह करना तथा उसके उपयोग की सुविधा प्रदान करना।
2. ज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में होने वाले आविष्कार, अन्वेषण, शोध तथा विकास सम्बन्धी उपयोगी नीवनतम एवं अर्वाचीन सामग्री का संकलन रख संरक्षण करना तथा भविष्य में प्रगति व विकास हेतु उपलब्ध कराना।
3. बालक, युवा, वृद्ध, नर-नारी को निरन्तर स्वशिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करना व इसके लिए अवसर प्रदान करना।
 4. वैयक्तिक सूचना मनोरंजन और प्रेरणास्पद साहित्य द्वारा अवकाश के क्षणों का सदुपयोग करने का अवसर प्रदान करना।
5. ज्ञान के विकास और शोधकर्मियों में व्यस्त व्यक्तियों को सतत सेवा व सहयोग प्रदान करना।
6. अपने दैनिक कार्यों में अधिकतम क्षमता एवं निपुणता प्राप्त करना।
7. देशवासियों में सृजनात्मक शक्ति को विकसित करने में सहयोग प्रदान करना एवं उनमें अपनी सभ्यता, संस्कृति, कला व साहित्य के प्रति अनुराग उत्पन्न करना।
8. प्रत्येक व्यक्ति को अच्छा राष्ट्रीय एवं विश्व नागरिक बनाने में सहायता प्रदान करना।
9. प्रत्येक सार्वजनिक समस्या के प्रति विचार-विमर्श व क्रियाशील आलोचनात्मक वातावरण उत्पन्न करने हेतु वातावरण का निर्माण करना।
सार्वजनिक पुस्तकालय के मुख्य उद्देश्य ऊपर दिये गये हैं। ऐसे पुस्तकालय का कर्तव्य समाज के हर व्यक्ति को पाठ्य सामग्री के माध्यम से बिना किसी भेदभाव शिक्षित करना है। ताकि वह एक उत्तम नागरिक की भांति समाज-सेवा में अपना योगदान दे सके। 

5. सार्वजनिक पुस्तकालय के कार्य

सार्वजनिक पुस्तकालय के कार्यों को यूनेस्को के मेनिफेस्टों में निम्न प्रकार अभिव्यक्त किया गया है
"पुस्तकालय जन शिक्षा के लिए जागृत शक्ति है। आज निर्विवाद रूप से यह मान लिया गया है कि पुस्तकालय जन शिक्षा व जन चेतना के प्रचार के लिए प्रमुख व सक्रिय माध्यम है। आज पुस्तकालय मात्र पुस्तकों के आदान-प्रदान का ही कार्य सम्पन्न नहीं करता वरन् जन साधारण में अधिकाधिक ज्ञान प्राप्त करने की अभिलाषा भी जागृत करता है।"
डॉ. रंगनाथन के अनुसार, सार्वजनिक पुस्तकालय के कार्य शैक्षणिक, सूचनात्मक, राजनैतिक, आर्थिक, प्राद्यौगिक, सांस्कृतिक तथा पुराविद है। अर्थात् सार्वजनिक पुस्तकालय अपने शैक्षणिक कार्यों के दवारा जन साधारण की शैक्षणिक अभिरुचि की पूर्ति करता है एच उसे विकसित करता हैं। उसकी बौद्धिक जिज्ञासा की पुष्टि सूचनात्मक कर्मों के माध्यम से करता है। राजनीतिक कार्यों के अन्तर्गत वह स्वस्थ जनमत का निर्माण करता है। आर्थिक कार्यों के अन्र्तगत विकसित तकनीक व उत्पादन की नवीन विधियों के संबंध में जनता को जानकारी प्रदान कर उनकी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करता है। सांस्कृतिक कार्यों के द्वारा राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय संस्कृति, सभ्यता, कला व ज्ञान के अपरिमित भण्डार से परिचित कराता है। पुराविद कार्यों के अन्तर्गत प्राचीन साहित्य, ज्ञान, कला एवं सभ्यता व संस्कृति से सम्बन्धित साहित्य, चित्र व चलचित्र उपलब्ध कराता है।
सार्वजनिक पुस्तकालय के उद्देश्य व्यापक हैं तथा उसका कार्य क्षेत्र सम्पूर्ण समाज है।
पुस्तकालयों के कार्यों की विवेचना निम्न प्रकार की जा सकती है -

5.1 उपयुक्त रख उचित अध्ययन सामग्री अवाप्त कराना

समाज के सभी व्यक्तियों की अनौपचारिक (Informal) शिक्षा एवं स्वशिक्षा हेतु; विविध विषयों में औपचारिक (Formal) शिक्षा प्राप्त करने वाले व्यक्तियों की सम्बन्धित विषयों में अभिरुचि को विकसित करने हेतु;
सभी की सूचना सम्बन्धी आवश्यकताओं रख मांगों की पूर्ति हेतु;
विभिन्न समुदायों रख संगठनों को शैक्षणिक, नैतिक रथ सांस्कृतिक गतिविधियों के संचालन में सहयोग प्रदान करने हेतु; समाज के सभी व्यक्तियों को उनके अवकाश के समय का सदुपयोग रचनात्मक रख सृजनात्मक कार्यों में करने हेतु प्रोत्साहनार्थ उपलब्ध पाठ्य सामग्री को पाठकों तक पहुँचाना।।
उपयोगी पाठ्य सामग्री को अवाप्त कर पाठकों तक उपयोग के लिए पहुँचाना सार्वजनिक पुस्तकालय का प्रमुख एवं महत्वपूर्ण कार्य है। इसके अभाव में अवाप्त पाठ्य सामग्री का प्रभावी उपयोग असम्भव है। यही सेवा पुस्तकालय को क्रियाशील एवं उपयोगी बनाती है। इस सेवा को प्रभावशाली बनाने के लिए स्व पुस्तकालय में निम्नलिखित कार्य सम्पन्न किये जाते है।
1. पाठ्य सामग्री का वर्गीकरण रण सूचीकरण कर उसको फलकों पर उचित क्रम में व्यवस्थित किया जाता है जिससे पाठक उसका उपयोग सरलता एवं सुगमतापूर्वक कर सके।
2. आदान-प्रदान की सुविधा जिसके अन्तर्गत पाठक को अध्ययनार्थ पाठ्य सामग्री घर ले | जाने की अनुमती दी जाती है जिससे पाठक अपनी वांछित पाठ्य सामग्री घर ले जाकर सुविधानुसार पढ़ सकता है।
3. पाठकों को अभीष्ट सूचना प्राप्त करने में सहायता एवं मार्गदर्शन प्रदान करता।
4. प्रचार एवं प्रसार सेवाओं के द्वारा समाज के अधिक से अधिक व्यक्तियों को पुस्तकालय उपयोग हेतु आकर्षित करना जिससे यह सामुदायिक केन्द्र के रूप में विकसित हो सके।

5.2 शैक्षणिक कार्य कराना

सार्वजनिक पुस्तकालय निरन्तर समाज कल्याण में रत रहते हुए शिक्षित और अशिक्षित दोनों को समान रूप से ज्ञान का वितरण कराता है। वास्तव में यह जीवंत केन्द्र है और सभी को समान रूप से शिक्षा ग्रहण करने का अवसर प्रदान करता है। पुस्तक को निर्बाध रूप से शिक्षा का सशक्त एवं महत्वपूर्ण साधन माना गया है और पुस्तकालय पुस्तकों के भण्डार हैं। पुस्तकों के माध्यम से समाज के सभी वर्गों के व्यक्तियों को समान रूप से अपनी शिक्षा का विकास करने का अवसर प्रदान करना सार्वजनिक पुस्तकालय का मुख्य शैक्षणिक कार्य है।

5.3 प्रौढ़-शिक्षा कार्यक्रमों को स्थायी एवं प्रभावशाली बनाना

देश की जनसंख्या का एक बहुत बड़ा भाग ऐसे प्रौढ़ व्यक्तियों का है जिन्हें बाल्य एवं युवावस्था में उचित शिक्षा प्राप्त करने का उपयुक्त अवसर प्राप्त नहीं हुआ। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् राष्ट्रीय सरकार ने इस दिशा में बहुत ध्यान दिया है एवं पंचवर्षीय योजनाओं में इस कार्यक्रम हेतु एक बड़ी धनराशि का प्रावधान कर समाज के इस अशिक्षित एवं अर्द्धशिक्षित वर्ग को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया है; परन्तु बड़े दुःख का विषय है कि प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रमों में सार्वजनिक पुस्तकालय की भूमिका को अनदेखा छोड़ दिया गया है। परिणामतः: यह कार्यक्रम स्थायी एवं प्रभावशाली नहीं बन पाया है।

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