8. भारतीय राष्ट्रीय पुस्तकालय । - Emitra Tutorials

Thursday, January 3, 2019

8. भारतीय राष्ट्रीय पुस्तकालय ।

8. भारतीय राष्ट्रीय पुस्तकालय ।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 62 के अनुसूची VII में राष्ट्रीय पुस्तकालय की स्थापना का प्रावधान है और उसे राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित करने का भी वर्णन किया गया है। भारत का राष्ट्रीय पुस्तकालय कोलकाता में स्थित है। इसके विकास का एक लम्बा इतिहास है, जिसका वर्णन निम्न प्रकार से किया जा सकता है।

8.1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

प्रथम चरण (1835-1903) कलकत्ता पालक लायब्रेरी
भारतीय राष्ट्रीय पुस्तकालय के विकास की कहानी को तीन भागों में बांटा जा सकता है। वर्तमान राष्ट्रीय पुस्तकालय के स्रोत में कलकत्ता सार्वजनिक पुस्तकालय अहम भूमिका रखती है। कलकत्ता सार्वजनिक पुस्तकालय की स्थापना कलकत्ता के जन समुदाय और वहाँ के स्थानीय विद्वानों द्वारा 1835 में हुई और या पुस्तकालय 21 मार्च 1836 में सर्वसाधारण के लिए खोल दिया गया। सन् 1844 में कलकत्ता सार्वजनिक पुस्तकालय एक बड़े भवन में हस्तांतरण किया गया। इस भवन को लाई मेटकॉफ के सम्मान में बनाया गया था। सन् 1857 में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रादुर्भाव हो गया था जिसके कारण 1859 में कलकत्ता के यूरोपीय समुदाय के लोगों ने पुस्तकालय को समर्थन देना बंद कर दिया।

वितीय चरण : (1903-1947) दी इम्पीरियल लाइब्रेरी

सन् 1899 में जब लाई कर्जन भारत में वॉयसराय बनकर आये तो उन्होंने कलकत्ता नगर के सभी पुस्तकालयों का एक सर्वेक्षण करवाया। नगर में एक अच्छे पुस्तकालय की स्थापना के उद्देश्य से कलकत्ता सार्वजनिक पुस्तकालय को क्रय कर उसे इम्पीरियल लाइब्रेरी में मिलने का विचार प्रकट किया जो की उस समय केवल सरकारी कर्मचारियों के लिए ही खुली थी। 30 जनवरी 1903 में लाई कर्जन द्वारा इसका शुभारम्भ इम्पीरियल लायब्रेरी के नाम से किया। ब्रिटिश म्यूजियम के सहायक ग्रंथालयी श्री जॉन मैकफरलैन (John Macfarlane) को इसका प्रथम ग्रन्थालयी नियुक्त किया गया। आपने इस पुस्तकालय में पत्रक सूची निर्माण का श्री गणेश किया और भारत भर में प्रकाशित होने वाले सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थों को एकत्रित करना पुस्तकालय का ध्येय बनाया। सन् 1908 में सुप्रसिद्ध भाषाविद श्री हरीनाथ डे को इसका ग्रन्थालयी नियुक्त किया गया। सन् 1911 में आपकी मृत्यु के पश्चात् श्री जे.ए. चेपमैन (J.A. Chapman) ने उस पुस्तकालय के पुस्तकालयाध्यक्ष पद का कार्यभार संभाला। । सन् 1928 में भारत सरकार ने इसके पुनर्गठन एवं प्रशासनिक सुधार हेतु श्री जे.ए. रिचे (J.A. Richey) की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। इस समिति ने अन्य सभी बिन्दुओं के साथ एक विशेष अनुशंसा की कि इम्पीरियल लाइब्रेरी को आवप्ति पुस्तकालय घोषित किया जाये, जिसके अनुसार विधि के अन्तर्गत या कानून द्वारा देश में प्रकाशित प्रत्येक पुस्तक की दो प्रतियाँ इस पुस्तकालय को भेजी जाये। परन्तु इस अनुशंसा का प्रभाव सन् 1954 में पुस्तक आवप्ति (सार्वजनिक पुस्तकालय) अधिनियम पारित होने के पश्चात् ही दिखाई दिया।

तृतीय चरण (1947-48) राष्ट्रीय पुस्तकालय

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात सन् 1948 में एक अधिनियम पारित कर भारत सरकार ने इसी इम्पीरियल लाइब्रेरी को राष्ट्रीय पुस्तकालय घोषित कर दिया। इसी वर्ष पश्चिम बंगाल में तत्कालीन राज्यपाल श्री चक्रवर्ती राजगोपालचारी ने पुस्तकालय को बेलवेडर (Belvedere) जो कि राजभवन था, में स्थानान्तरित कर देने की अनुशंसा की। 1951 में इसको बलवेडर में स्थानान्तरित कर दिया गया। अब राष्ट्रीय पुस्तकालय इसी भवन में स्थित है। श्री बी.एस. केसवन को राष्ट्रीय पुस्तकालय के प्रथम पुस्तकालयाध्यक्ष नियुक्त किया गया। 1 फरवरी 1953 को उस समय के देश के शिक्षामंत्री मौलाना अब्दुल कलाम आजाद द्वारा इसे सर्व साधारण के लिए खोल देने की घोषणा की गई।
। सन् 1954 में भारत सरकार द्वारा "डिलीवरी ऑफ (पब्लिक लायब्रेरीज ) बुक। एक्ट" पारित किया गया। सन् 1956 में इसमें संशोधन करके पत्र-पत्रिकाओं को भी इसमें सम्मिलित कर लिया गया। इसके अधीन भारत में प्रकाशित प्रत्येक ग्रंथ की एक प्रति इस पुस्तकालय को नि: शुल्क प्रकाशकों से प्राप्त होती है।

8.2. संगठन एवं प्रबन्ध

वर्तमान में प्रशासकीय रूप से राष्ट्रीय पुस्तकालय मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय के अन्तर्गत कार्य करता है। निदेशक राष्ट्रीय पुस्तकालय का प्रमुख होता है। निदेशक की सहायता के लिए दो पुस्तकालयाध्यक्ष होते है। तकनीकी एवं प्रशासकीय कार्यों के लिए उप पुस्तकालयाध्यक्ष, सहायक पुस्तकालयाध्यक्ष, तकनीकी एवं व्यावसायिक सहायकों का एक दल होता है इसके अतिरिक्त दो प्रशासनिक अधिकारी भी होते है जो प्रशासनिक मामलों में निदेशक की सहायता करते है।
राष्ट्रीय पुस्तकालय को कार्य के आधार संगठित किया गया है। मुख्य रूप से पुस्तकालय में दो विभाग है। एक तकनीकी या व्यावसायिक और दूसरा प्रशासनिक तकनीकी व्यावसायिक विभाग में पुस्तक चयन, क्रय, प्रस्तुतीकरण और पाठक सेवा पुस्तक संरक्षण, पुनरावृत्ति, प्रयोगशाला संबन्धी आदि कार्य सम्पन्न होते है। क्या प्रशासकीय विभाग में मुख्य रूप से प्रशासन सुरक्षा तथा बाग-बगीचे से सम्बन्धित कार्य होते है तथा राष्ट्रीय पुस्तकालय को बजट भारत सरकार द्वारा प्रदान किया जाता है। कुल कर्मचारियों की संख्या 800 है।
8.3. संग्रह कुल
31 मार्च 1999 में राष्ट्रीय पुस्तकालय का संग्रह निम्न प्रकार का था (i) पुस्तकें
27,00,000 (लगभग) (ii) पत्रिकायें
6,00,000 (iii) पण्डुलिपियाँ
3,000 (iv) मैप (मानचित्र) और एटलस
85,000 (v) माइक्रोफिल्मस
96,000 (vi) फोटोग्राफ्स
1,21,500 (vii) गर्वनमेन्ट डाक्यूमेन्ट्स
4,72,000
40,77,500 ।
पुस्तकालय संकलन के निम्नलिखित स्रोत है:(i) पुस्तक आवप्ति अधिनियम के अन्तर्गत देश में प्रकाशित साहित्य प्राप्त, है, (ii) क्रय द्वारा, (ii) दान स्वरूप, (iv) विनिमय द्वारा।
राष्ट्रीय पुस्तकालय के 56 देशों व 170 से भी अधिक संस्थाओं से विनिमय सम्बन्ध है। इसी विनिमय के दारा पुस्तकालय ने अपना विदेशी पुस्तकों का संग्रह समृद्ध कर लिया है। इसके संग्रह को समृद्ध बनाने में निम्न महान व्यक्तियों के व्यक्तिगत संग्रह का स्थान भी महत्वपूर्ण है।
(i) आशुतोष मुखोपाध्याय का संग्रह। (i) बूटार के अरबी तथा फारसी पाण्डुलिपि संग्रह। (iii) जे.एन. सरकार के इतिहास की पुस्तकों का संग्रह। (iv) द्रविड़ भाषाओं के बाला मायुरी में पाण्डुलिपी संग्रह। (V) सुरेन्द्र नाथ सेन की पुस्तकों का संग्रह। (vi) थिवटिस संस्थान का पुस्तक संग्रह। (vii) रामदास सेन का बंगला संग्रह। (viii) सर तेज बहादुर सपू के पत्र व्यवहार का संग्रह जो भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन पर प्रकाश डालता है।

8.4. पुस्तक प्रस्तुतीकरण

ए.ए.सी.आर.|| के अनुसार पाठ्य सामग्री का सूचीकरण तथा वर्गीकरण ड्यूई दशमलव के अनुसार किया जाता है। बुक नम्बर के लिए कटर के तीन अक्षरवाली टेबल को व्यवहार में लाया जाता है। पुस्तकालय सूची काई रूप में व मुद्रित रूप, दोनों ही प्रकार से उपलब्ध है। मुद्रित सूची 10 खण्डों में लेखक और विषय के अनुसार वर्णानुक्रम में क्रमबद्ध है।

8.5. पाठक सेवायें

राष्ट्रीय पुस्तकालय अपने पाठकों को निम्न सेवायें प्रदान करती है। (i) लेन-देन सेवाये : भारतीय राष्ट्रीय पुस्तकालय की यह एक विशेषता है कि यह अपने यहाँ संग्रहित कुछ पुस्तकों के संग्रहों को छोड़कर, जिसमें दान संग्रह, दुर्लभ पुस्तकें, सरकारी या संयुक्त राष्ट्र प्रकाशन, व दस्तावेज आदि सिम्मिलित है, शेष पुस्तकों को अपने प्रयोक्ताओं को पुस्तकालय से बाहर अपने घर ले जाने की सुविधा प्रदान करता है। किसी देश के राष्ट्रीय पुस्तकालय में यह सेवा उपलब्ध नहीं है। अत: पुस्तकालय ऋण (Inter Library Loan) की सुविधा सदस्यों व संस्थाओं को उपलब्ध है। इसके द्वारा अन्य पुस्तकालयों को भी सहयोग मिलता है और उनसे प्राप्त भी किया जा सकता है।

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