7.2 स्वतन्त्रता पश्चात् सार्वजनिक पुस्तकालयों की स्थिति - Emitra Tutorials

Thursday, January 3, 2019

7.2 स्वतन्त्रता पश्चात् सार्वजनिक पुस्तकालयों की स्थिति

7.2 स्वतन्त्रता पश्चात् सार्वजनिक पुस्तकालयों की स्थिति

इसके अतिरिक्त कुछ व्यक्तिगत प्रयासों द्वारा स्थापित सार्वजनिक पुस्तकालय थे जिनके उपयोगार्थ भी शुल्क आवश्यक था। इस प्रकार स्वतन्त्रता पूर्व एवं पश्चात् तक पुस्तकालयों का उपयोग समाज के कुछ ऐसे संभ्रान्त व्यक्तियों तक ही सीमित था जो उनके उपयोगार्थ शुल्क दे सकते थे। इन पुस्तकालयों में संग्रहीत अधिकांश पुस्तकें अंग्रेजी भाषा में थी जिन्हें विदेशों से आयात किया था तथा साधारण नागरिकों, नवसाक्षरों एवं बच्चों के उपयोग के लिये उपयुक्त पुस्तकों का सर्वथा अभाव था।
जनसंख्या का अधिकांश हिस्सा अर्थात् 88 प्रतिशत गांवों में निवास करता था, साक्षरता बहुत कम अर्थात् 15 प्रतिशत थी। हिन्दी व अन्य स्थानीय भाषाओं में पुस्तकों का अभाव था। साथ ही तात्कालीन प्रशासन ने न तो इन कमियों को दूर करने का ही प्रयास किया और ना ही सार्वजनिक पुस्तकालयों के विकास को प्रोत्साहित ही किया। इन कारणों से सार्वजनिक पुस्तकालयों की स्थिति शोचनीय रही।

7.2 स्वतन्त्रता पश्चात् सार्वजनिक पुस्तकालयों की स्थिति

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् राष्ट्रीय सरकार से उम्मीद थी कि वह समाज के सभी वर्गों की पठन-पाठन एवं सूचना सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सभी स्तरों पर सार्वजनिक पुस्तकालयों का विकास करेगी। इस सम्बन्ध में कुछ प्रयास भी हुए हैं, जो निम्न प्रकार है - | 1. सन् 1948 में तत्कालीन मद्रास राज्य में देश का सर्वप्रथम पुस्तकालय अधिनियम (Act) बना, जिससे इस राज्य में सभी स्तरों पर सार्वजनिक पुस्तकालयों की स्थापना एवं प्रसार के कार्य का मार्ग प्रशस्त हुआ।
2. राष्ट्र की प्रथम पंचवर्षीय योजना 1951-56 में "पुस्तकालय सेवा सुधार" कार्यक्रम को सम्मिलित किया गया। जिससे सम्पूर्ण राष्ट्र में पुस्तकालयों का जाल बिछाने पर विचार किया गया। इस योजनानुसार सभी राज्यों में राज्य केन्द्रीय पुस्तकालय तथा जिला स्तर पर जिला पुस्तकालयों की स्थापना के लिये केन्द्रीय सरकार द्वारा राज्य सरकारों को आर्थिक सहायता प्रदान की गयी। कई राज्यों ने इस योजना का लाभ भी उठाया।

"पुस्तकालय सेवा सुधार" कार्यक्रम

| इस अवधि में सन् 1956 में तात्कालीन हैदराबाद राज्य में पुस्तकालय अधिनियम पारित हुआ जिससे इस राज्य में सार्वजनिक पुस्तकालय विकास की और अग्रसर हुए। आन्ध्रप्रदेश बन जाने पर सन् 1960 में आन्ध्र प्रदेश सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम का निर्माण हुआ।
3. द्वितीय पंचवर्षीय योजना में भी सार्वजनिक पुस्तकालयों के विकास हेतु यथोचित ध्यान दिये जाने से यह आशा बंधी थी कि सम्पूर्ण राष्ट्र में राज्य केन्द्रीय पुस्तकालयों रख जिला पुस्तकालयों का जाल बिछ जायेगा ओर ये राष्ट्रीय पुस्तकालयों से सम्बद्ध हो जायेंगे।
सन् 1957 में भारत सरकार ने राष्ट्र में सार्वजनिक पुस्तकालयों की स्थिति का सर्वेक्षण कर देश के लिए उपयुक्त 'सार्वजनिक पुस्तकालय तन्त्र" की संरचना के सुझाव के लिए एक परामर्शदात्री समिति (Advisory Committee for Libraries) की स्थापना की जिसके अध्यक्ष डॉ.के.पी सिन्हा थे। इस समिति द्वारा सन् 1957 में अपना प्रतिवेदन तात्कालीन शिक्षा मन्त्री, भारत सरकार को प्रस्तुत कर दिया गया था परन्तु समिति की अनुशंसाओं पर कोई कार्यवाही नहीं की गयी।
4. सन् 1965 एवं 1967 में क्रमश: मैसूर राज्य का सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम एवं महाराष्ट्र सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम पारित हुए। सन् 1979 में पश्चिमी बंगाल सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम बना। वर्तमान में 11 राज्यों में सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम पारित हो चुके हैं- इन राज्यों के नाम है - तमिलनाडु (1948), आंध्रप्रदेश (1960), कर्नाटक (1965), महाराष्ट्र (1967), पश्चिमी बंगाल (1979)ए, केरल (1987), हरियाणा (1987), मणिपुर (1988), मिजोरम (1993), गोवा (1993), एवं गुजरात (2001)।
उपरोक्त प्रयासों के अतिरिक्त भी सभी स्तरों केन्द्रीय, क्षेत्रीय, राज्य, स्थानीय आदि पर कुछ प्रयास किये गये। परन्तु पूरे राष्ट्र में सार्वजनिक पुस्तकालयों का समुचित विकास निम्न कारणों से संभव न हो सका।

7.3 समस्यायें | (i) साक्षरता का अभाव: 

पश्चिमी देशों में प्रजातन्त्र औद्योगिक क्रान्ति, समाज शिक्षा एव सर्वतोन्मुखी शिक्षा (Universal Education) का परिणाम था, परन्तु भारत के प्रजातन्त्र की नींव बहुत बड़े निरक्षर समुदाय पर रखी गयी जो सार्वजनिक पुस्तकालय की उपयोगिता को न तो समझ सकते थे और न ही सराह सकते थे। अत: प्रजातन्त्र का समाजीकरण सार्वजनिक पुस्तकालय द्वारा पोषित सर्वतोन्मुखी शिक्षा (Universal Education) के माध्यम से होना ही राष्ट्र हित में है। देश में शिक्षा का प्रतिशत पिछले चार दशकों में 15% से बढ़कर 36% अवश्य हो गया है परन्तु जिस तीव्र गति से जनसंख्या में वृद्धि हो रही है उसके कारण निरक्षरों की संख्या में भी असीमित वृद्धि हो गयी है।
प्रजातन्त्र में बहुमत की आकांक्षाएं सर्वोपरि होती हैं। अत: उस देश में जहां शैक्षणिक पिछड़ापन है व अधिकांश जन समुदाय निरक्षरता के अंधकार में लिप्त है, वहाँ सार्वजनिक पुस्तकालयों के विकास की मांग का प्रश्न ही नहीं उठता। इसलिए साक्षरता का अभाव सार्वजनिक पुस्तकालयों के विकास में बाधक है।

(ii) आर्थिक विषमताएँ (असमानता) (Inadequate Financing): 

भारत सरकार द्वारा नियुक्त पुस्तकालय परार्मशदात्री समिति (Advisory Committee for Libraries) ने अपने प्रतिवेदन में लिखा है कि भारत में पुस्तकालय सेवा पर प्रति पाँच व्यक्ति एक आना (नये छ: पैसे) प्रतिवर्ष व्यय किया जाता है, जबकि इंग्लैण्ड व अमेरिका में इसी कार्य पर क्रमश: रु. 3.50 व रु. 4.55 प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष खर्च किया जाता है। इससे स्थिति स्पष्ट है कि ऐसी आर्थिक विषमता में भारत में सार्वजनिक पुस्तकालयों का विकास कैसे सम्भव हो सकता है।
योजना आयोग द्वारा नियुक्त पुस्तकालयों हेतु कार्यकारी समूह (Working Group on Libraries) ने 1965 में प्रकाशित अपने सर्वेक्षण में स्पष्ट किया है कि भारत में होने वाला व्यय अमेरिका एवं इंग्लैण्ड की अपेक्षा बहुत कम है और राष्ट्रीय आय की तुलना में जितना व्यय इस मद पर किया जाना चाहिए उतना भी नहीं किया जा रहा है। यही कारण है। कि यहाँ प्रति व्यक्ति पुस्तकों की संख्या व अध्ययन की अभिरुचि कम है जो पुस्तकालयों के विकास के लिए आवश्यक है।
पुस्तकालयों के प्रभावी विकास के लिए सुदृढ़ एवं सुनिश्चित अर्थ व्यवस्था आवश्यक है। परन्तु भारत में पुस्तकालयों के विकास हेतु सुनिश्चित आर्थिक सहायता केवल उन्हीं राज्यों में उपलब्ध है जिनमें पुस्तकालय अधिनियम पारित हो चुके है। शेष राज्यों में धनाभाव सार्वजनिक पुस्तकालयों के विकास में बाधक है। |

(iii) अध्ययन अभिरुचि हेतु अभिप्रेरणा का अभाव (Lack of Motivation for Reading)

 भारत में अधिकांश जनसंख्या गरीबी, निरक्षरता अज्ञानता एवं रूढ़िवादिता के शिकंजे में जकड़ी हुयी है। सामाजिक जीवन पारम्परिक एवं शिथिल है जिसमें नवीन चुनौतियों का अभाव है। ऐसी स्थिति में अध्ययन हेतु प्रेरणा का अभाव स्वाभाविक है। इसके विपरीत पश्चिमी विकसित देशों में जीवन औद्योगिक क्रान्ति एवं आधुनिकीकरण के प्रभाव से अपारम्परिक एवं गतिशील है। जिसके कारण समाज के अधिकांश व्यक्तियों को नित्य प्रति नवीन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। 

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