Early Satavahans-Their rise upto Satakari I - Emitra Tutorials

Friday, December 7, 2018

Early Satavahans-Their rise upto Satakari I

Early Satavahans-Their rise upto Satakari I

उत्तरी भारत में सातवाहनों की शक्ति अधिक समय तक कायम नहीं रही। मगध पर अधिकार करने के कुछ समय बाद ही उत्तरी भारत पर होने वाले विदेशी आक्रमणों तथा सम्भाग में स्थानीय राज्यों के उठने के कारण सातवाहनों का उत्तरी भारत से अधिकार समाप्त हो गया । लेकिन दक्षिण भारत में इनकी शक्ति ई. सन् की तीसरी शताब्दी से मध्यकाल तक चलती रही और वे तत्कालीन भारत की एक प्रमुख शक्ति के रूप में बने रहे।
सातवाहनों का शासक - शतकाणि प्रथम तक उनका उत्थान । शिशुक अथवा सिमुक लगभग 46 ई. पू. में शिशुक नामक आन्ध्रदेशीय राजा ने वंश के नाम से प्रसिद्ध हुआ । उसने कण्वों तथा शृंगों की शेष शक्ति को समाप्त कर अपना आधिपत्य रथापित किया । उसको इस साहसिक कार्य में अन्य आन्ध्र प्रत्य तथा रठिक और भोज भी सम्मिलित थे ।

 सिमुक ने राजा होने पर इन लोगों को पुरस्कृत किया । यद्यपि इस राज्य का शासनकाल विवादग्रस्त है लेकिन इतना निश्चित है कि सिमुक ही सातवाहन वंश का संस्थापक था और उसने जैन और बौद्ध धर्मों को संरक्षण दिया । उसकी राजधानी गोदावरी नदी के उत्तरी तट पर स्थिति प्रतिष्ठान या पैठन नामक नगरी थी । पुराणों के अनुसार सिमुक ने लगभग 23 वर्ष तक राज्य किया वह एक प्रतापी और योग्य राजा सिद्ध हुआ । जीवन के अन्त में कुछ क्रूर होकर जैनों के प्रि अत्याचार करने के कारण उसे सिंहासन से हटाकर मार डाला गया।
| कृष्ण या कान्ह- सिमुक की मृत्यु के पश्चात् लगभग 23 ई. पू. में उसका भाई कृष्ण या कान्ह राजा हुआ। जिसके समय में सातवाहन राज्य पश्चिम में नासिक तक फैला । कान्ह का उल्लेख नासिक के एक गुफा अभिलेख में मिलता है कुछ इतिहाकार कान्ह को सिमुक का पुत्र मानते हैं। परन्तु पुराणों में उल्लेख है कि यह सिमुक का छोटा भाई था । 

कान्ह अपने शासन काल में नासिक में भ्रमणों के लिए एक गुफा का निर्माण कराया । इस गुफा के निर्माण से प्रमाणित होता है कि उसने नासिक तक का प्रदेश अपने अधिकार में ले लिया था । कान्ह के शासन काल में पश्चिमी और पूर्वी समुद्रों के समस्त प्रदेशों पर सातवाहन शासन की स्थापना के लक्षण दिखाई देने लगे । कान्ह ने लगभग 10 वर्षों तक शासन किया ।। | शतकर्णि प्रथम- कान्ह के पश्चात् लगभग 13 ई. पू. में उसका पुत्र शतकणि राजा बना। यह सातवाहन वंश का वास्तविक अर्थों में प्रथम पराक्रमी शासक था । पुराणों में उसे कान्ह का पुत्र बताया गया है परन्तु इतिहासकार शतकर्णि के नानाघाट से प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर सिमुक का पुत्र मानते हैं। इस प्रतापी सम्राट की राजधानी भी गोदावरी के तट पर स्थित प्रतिष्ठान या पैठन में थी । उसका विवाह अमगीय कुल की राजकुमारी नयनिका से हुआ । इस कुल का नानाघाट अभिलेख में वर्णन है एवं इस कुल के साम्राटों को महाराठी की उपाधि प्राप्त थी । ।

| शतकर्णि के नाम को लेकर कुछ इतिहासकारों ने शंका व्यक्त की है और अपने कथन में कहा है कि नानाघाट अभिलेख में केवल शतकर्णि नाम है जबकि सांची के स्तूप द्वार पर के शतकर्णि है। द्वितीय जो बाद के शतकर्णि हुए उनकी तरह इसके नाम के आगे मातृवाची नाम नहीं है इस सन्देह का समाधान करते हुए डॉ. राय चौधरी कहते है कि “प्रथम शतकर्णि ने अपना उल्लेख बिना किसी सम्बोधनं के किया यह स्वाभाविक था तथा पर शतकर्णियों का मातृवाची उल्लेख भी स्वाभाविक था।” | शतकर्णि प्रथम ने अपने साम्राज्य की सीमाओं को बढाया। नानाघाट अभिलेख में उसके साम्राज्य विस्तार अभियान को उल्लेख प्राप्त होता है। इसके साम्राज्य विस्तार को लेकर विभिन्न इतिहासकारों में मतक्य नहीं है। जैसा कि उल्लेख मिलता है कि शतकणि प्रथम को ‘अप्रतिहत चक्र दक्षिणपति' कहा गया है इससे स्पष्ट होता है कि वह दक्षिण पथ का पूर्ण रूपेण स्वामी था । 

परन्तु कुछ विद्वान् इतिहासकार इस मत से सहमत नहीं है, उनका विचार है कि दक्षिण पथ का अर्थ सीमित है इससे महाराष्ट्र तथा मालवा का कुछ भाग ही उसके अधीन मानना चहिए । नानाघाट अभिलेख द्वारा इस बात की भी जानकारी प्राप्त होती है कि शतकर्णि ने नर्मदा घाटी के प्रदेश व विदर्भ पर भी जीत हासिल की। सांची अभिलेख से प्राप्त विवरण के अनुसार शतकर्णि प्रथम ने पूर्वी मालवा को भी अपने अधिकार में ले लिया था।
शतकर्णि ने दक्षिण पथ को अपने अधिकार में लेने के पश्चात् दो अश्वमेघ यज्ञ किया। इन यज्ञों में उसने विपुल धन राशि हजारों गायें, घोड़े, हाथी आदि ब्राह्मणों को दान में दिये। और “दक्षिणापथपति” की उपाधि धारण की

| कलिग सम्राट खारवेल से युद्ध- हाथी गुम्फ अभिलेख के अनुसार कलिंग के सम्राट खारवेल ने भारी सैन्य शक्ति के साथ शतकर्णि पर आक्रमण किया। खारवेल की सेना ने असिक नगर को ध्वस्त कर दिया । इतिहासकारों के अनुसार यह नगर मुसिक नगर था । जो कृष्णा और मूसि नदियों केसंगम पर स्थित था । कलिंग सम्राट खारवेल की भाँति शतकर्णि भी विजय का अभिलाषी था। अत: इस महत्वाकांक्षा के होने पर दोनों में संघर्ष आवश्यक था। खारवेल के आक्रमण का पूर्ण उल्लेख हाथी गुम्फ अभिलेख में मिलता है। इसी अभिलेख के आधार पर विदित होता है कि कलिंगाधिपति की सेवाएँ मुसिक नगर को क्षत-विक्षत कर वापस आ गई । इस आक्रमण में शतकर्णि का साम्राज्य अप्रभावित रहा।| शतकर्णि प्रथम ने अपने पराक्रम से एक विस्तृत राज्य की स्थापना की। 

इसके साम्राज्य में महाराष्ट्र, कोंकण और मालवा प्रदेश शामिल थे। वह सातवाहन वंश का ऐसा पहला पराक्रमी शासक था जिसने विन्ध्य प्रदेश में सार्वभौम सत्ता की स्थापना की इसी, के काल में गोदावरी घाटी में प्रथम महल साम्राज्य का उदय हुआ। इसके साम्राज्य का विस्तार एवं शक्ति इतनी बढ़ी जिसके कारण शुंग साम्राज्य व पंचनन्द के पवन राज्य को काफी पीछे छोड़ दिया। इस प्रतापी सम्राट ने केवल 9 वर्ष शासन किया। इस अल्पावधि में उसके काल में व्यापार में काफी उन्नति हुई । उपलब्ध तथ्यों के अनुसार कल्याण व्यापार का मुख्य केन्द्र था। शतकर्णि ने सिरीसात या ‘सातकर्णि' के नाम से मुद्रा प्रसारित की।

गौतमी पुत्र शतकर्णि-शतकर्णि प्रथम के पश्चात् से सातवाहनों का इतिहास काफी समय तक अन्धकारमय रहा । लगभग 106 ई. पू. में गौतमी पुत्र शतकणि सातवाहन वंश के महानतम् सम्राटों में से एक था। 

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