प्रश्न 36. शकों तथा उनकी शासन व्यवस्था के बारे में आप क्या जानते हैं? - Emitra Tutorials

Friday, December 7, 2018

प्रश्न 36. शकों तथा उनकी शासन व्यवस्था के बारे में आप क्या जानते हैं?

प्रश्न 36. शकों तथा उनकी शासन व्यवस्था के बारे में आप क्या जानते हैं?


नेहपान—पश्चिमी भारत के क्षत्रपों में नेहपान का नाम सबसे अधिक उल्लेखनीय है। वह एक महत्त्वाकांक्षी शासक था और उसका राज्य काफी विस्तृत था । नहपान ने सात वाहनों पर आक्रमण कर महाराष्ट्र को अपने अधिकार में किया । महाराष्ट्र में प्राप्त नहपान के चाँदी के सिक्के इस बात का प्रमाण हे । नासिक अभिलेखों में उसके बाद उसके दामाद, ऋषभदत्त के नामों का उल्लेख है। तथा उसमें महाराष्ट्र आदि प्रमुख प्रान्तों का भी उल्लेख है जैसे प्रभास, भृगुकच्छ (भड़ौच) पारद (सूरत) पुष्कर (अजमेर) आदि। इससे यह सरलता से अनुमान होता है कि उसका राज्य महाराष्ट्र में ही सीमित नहीं था वरन् काठियावाड़, बम्बई, मालवा तथा राजपूताना (अजमेर) तक सीमित था। राज्य विस्तार के लिए उसने कौन-कौन से युद्ध लड़े इसकी जानकारी नहीं मिलती । 

नासिक गुहा लेख से उसके केवल एक युद्ध की जानकारी मिलती है जो मालवा आक्रमणकारियों के विरूद्ध लड़ा गया। जोगल्थम्मी मुद्रा भाण्ड में नेहपान की बहुत-सी मुद्राएँ मिली है। इनमें से अधिकांश मुद्राऐं ऐसी हैं जिन पर गौतमी पुत्र शतकर्णी ने अपना नाम मुद्रित करवाकर पुनः प्रसारित करवाया था। इससे स्पष्ट होता है कि गौतमी पुत्र ने नेहपान को परास्त किया था। उसकी मृत्यु के पश्चात् इस शक राज्य का अन्त हो गया। नासिक गुम्फ अभिलेख से नेहपान के तिथिक्रम का भी पता चलता है। अभिलेख में 41वें 42वें वे 45वें वर्षों का वर्णन है। इतिहासकारों के अनुसार ये तिथियाँ शक सम्वत् की है जिसके अनुसार नेहपाने के महाराष्ट्र का शासनकाल 119 ई. बैठता है। एक अन्य अभिलेख में 46वें वर्ष का उल्लेख है । इसके अनुसार अन्तिम तिथि 124 ई. हो सकती है ऐसा दिखाई देता है कि 124 ई. के लगभग क्षहरात शासन समाप्त हो गया।

(3) उज्जयिनी के क्षत्रप उत्तरी भारत में एक दूसरे क्षत्रप वंश का उदय हुआ। इसका मुख्य केन्द्र उज्जैन था उज्जयिनी था। इस क्षत्रप वंश का संस्थापक यसोमतिक (जामोतिक) था जो चष्टन का पिता था । चष्टन बड़ा ही पराक्रमी था। उसी ने इस क्षत्रप वंश को राजपद दिलाया था । यसोमतिक का नाम सीथियन उत्पत्ति का है। उसके एक वंशज को जो चन्द्रगुप्त द्वितीय द्वारा मारा गया बाण ने अपने ‘हर्षचरित' में शक राजा ने कहा है। इसलिए इतिहासकार इस बात को स्वीकार करते हैं कि उज्जैन का क्षत्रप कुल शक जाति का ही था। उज्जैन के शक क्षत्रपों के कुल ने काफी समय तक शासन किया और देश की राजनीतिक उथल-पुथल तथा सामाजिक नव-निर्माण कार्यों में काफी महत्त्वपूर्ण भाग लिया। * चष्टन उज्जैन का प्रथम शक शासक था। उसके पिता ने उसके वंश की प्रतिष्ठापना अवश्य की थी । परन्तु उज्जैन में अपने वंश का शासन प्रारम्भ करने वाला चष्टन ही था। उसका समय 130 ई. के लगभग का है।

 इस तरह कुछ इतिहासकार चष्टन को कुषाण का क्षेत्रप मानते हैं प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. नाहर के कथनानुसार “नहपान की मृत्यु के पश्चात् ऐसा दिखाई देता है कि दक्षिणी पश्चिमी भागों का उप शासक कुषाणों ने चष्टन को ही नियुक्त कर दिया और उसे सातवाहनों से अपने शासन के अन्तर्गत उन भागों को पुनः अधिकार में करने का आदेश भी दिया जो नहपान के समय में गौतमी पुत्र शतकर्णी ने जीत लिये थे।” जब चष्टन अपनी वृद्धावस्था में महाक्षत्रप हो गया तो उसने अपने पुत्र जयदामन को क्षत्रप नियुक्त कर दिया। लेकिन जयदामन अपने उत्तरदायित्व को अधिक समय तक वहन नहीं कर सका और शीघ्र ही उसकी मृत्यु हो गयी और इसके पश्चात् रुद्रदामन प्रथम ने उसका स्थान लिया।

रुद्रदामन–चष्ट्रन के पश्चात् इस क्षत्रप राज्य का अधिकारी रुद्रदामन बना । वह उज्जयिनी क्षत्रप शासकों में सबसे अधिक पराक्रमी और प्रतिभा सम्पन्न था । जिसने अपने वंश की शक्ति और प्रतिष्ठा में बहुत वृद्धि की जूनागढ़ में मिले अभिलेख से स्पष्ट होता है कि रुद्रदामन ने स्वयं अपने पराक्रम से महाक्षत्रप का पद प्राप्त किया था। इससे यह आभास मिलता है कि उसने कुषाणों की अधीनता स्वीकार नहीं की । रुद्रदामन ने अपने समकालीन दक्षिण पथ के स्वामी सातवाहन राजा वशिष्ट पुत्र शिव श्री शतकर्णी को दो बार परास्त किया। दक्षिणी पंजाब के योद्धाओं को परास्त किया। उसके साम्राज्य में पूर्वी और पश्चिमी मालवा, द्वारका के आस-पास का प्रदेश मान्धाता प्रदेश, जूनागढ़ के आस-पास का प्रदेश साबरमती नदी तट प्रदेश का कुछ भाग, मारवाड़, कच्छ, सिन्ध तथा उत्तरी कोंकण के प्रदेश सम्मिलित थे। रुद्रदामन ने इन प्रदेशों में से अधिकतर को गौतमी पुत्र के उत्तराधिकारियों से जीता । उसने कनिष्क के उत्तराधिकारियों से सम्भवतः सिन्धु-साचीर प्रान्त जीता था।

रुद्रदामन अच्छा विजेता होने के साथ-साथ अच्छा प्रशासक भी था । वह जनहित का ध्यान रखने वाला तथा विद्याप्रेमी शासक था। उसने अपने साम्राज्य को अनेक प्रान्तों में विभाजित किया और प्रत्येक प्रान्त के लिए अपने अमात्य नियुक्त किये। उसके शासनकाल में चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा बनवाई गई सुदर्शन झील का बाँध टूट गया । और काठियावाड़ की जनता में हाहाकार मच गया तब रुद्रदामन ने विपुल धनराशि व्यय करके पहले से भी मजबूत और विशालतर बाँध का निर्माण कराया । इस व्यय की गई राशि का भार प्रजा पर नहीं डाला गया। लोगों से बेगार भी नहीं ली गई और न किसी तरह उन्हें कष्ट पहुँचाया गया । इस तरह रुद्रदामन ने अपनी लोक कल्याणकारी रूचि का परिचय दिया। रुद्रदामन की प्रशंसा में कई बातें कही गई हैं। वह वीर कुशल और एक सुशिक्षित व्यक्ति था । वह व्याकरण, राजनीति, संगीत और न्याय का अच्छा ज्ञाता था। गद्य-पद्य काव्यों में वह प्रवीण शा। वह संस्कृत भाषा और साहित्य का आश्रयदाता था ।

 अर्थशास्त्र का भी उसे अच्छा ज्ञान था। व्यर्थ के युद्धों एवं हत्याकाण्डों से वह घृणा करता था। इस योग्य, उदार और कुशल शासक के शासन काल में उज्जयिनी सम्भवतः पुनः विद्या और वैभव से पूर्ण हो गयी । रुद्रदामन के पश्चात् चष्टन वंश में उसका पुत्र दामोजद श्री महाक्षत्रप हुआ और उसके पश्चात् जीवदामन तथा भाई रुद्रसिंह प्रथम में गद्दी के लिए संघर्ष हुआ । लगभग 178 ई. में जीवदामन महाक्षत्रप बना और 181 ई. में रुद्रसिंह प्रथम महाक्षत्रप बना । इस वंश का अन्तिम सम्राट रुद्रसिंह तृतीय रहा। इसी के काल में चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने मालवा और काठियावाड़ को जीत लिया और शकों की सत्ता समाप्त कर दी। । शक भारत में विदेश आक्रमणकारियों के रुप में आये थे किन्तु यहाँ आने के पश्चात् वे भारतीय जन-जीवन में घुल- मिल गये । यहाँ रहते हुए उन्होंने भारतीय आचार-विचार धर्म और रहन-सहन को अपना लिया और यहाँ के लोगों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये। इस प्रकार वे भारतीय समाज के अंग बन गये।

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