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Wednesday, April 17, 2019

मांग के पुस्तक चयन सिद्धांत को स्पष्ट कीजिये

April 17, 2019 0
मांग के पुस्तक चयन सिद्धांत को स्पष्ट कीजिये

मांग के पुस्तक चयन सिद्धांत को स्पष्ट कीजिये

इस प्रकार इन पुस्तक-चयन कार्डों का उपयोग विभिन्न स्रोतों से पुस्तकालय की आवश्यकता अनुसार सभी संभावित क्रय योग्य एवं उपयोगी पुस्तकों का चयन करने के लिये किया जाता है । इन कार्डों को विषयों के अनुसार अलग-अलग कर लिया जाता है । फिर प्रत्येक विषय में इन्हें वर्णानुक्रम में लगा लिया जाता है । तत्पश्चात एक पुस्तक- चयन सूची तैयार कर ली जाती है, जिसे 3 प्रतियों में टाईप करवा कर अनुभागाध्यक्ष/विषयविशेषज्ञ/पुस्तक/चयन-समिति के सदस्य को अनुशंसा एवं वास्तविक-चयन प्रपत्र के साथ भेज दी जाती है |
उपरोक्त चिन्ह की पुस्तकें अलग-अलग कैबिनेटों में वर्णानुक्रम में व्यवस्थित कर देते हैं। | इनका उपयोग भविष्य में अधिक वित्तीय सहायता प्राप्त होने पर किया जा सकता है । शोधछात्र इनका उपयोग संदर्भ हेतु कर सकते है।
अंतिम रूप से स्वीकृत कार्डों की आर्डर हेतु प्रसूची तैयार कर ली जाती है । यह सूची विषयवार प्रकाशक अथवा विक्रेता के अनुसार तैयार की जाती है । इन सूचियों की तीन प्रति टाइप करवाकर आईर-पत्र व नियम शर्तों के साथ डाक द्वारा भेज दिया जाता है । पुस्तक चयन कार्डों को आर्डर क्रमांक के क्रम में जमाकर अलग ट्रे में व्यवस्थित कर लेते हैं इस प्रकार पुस्तकें पुस्तक-अर्जन के लिए तैयार हो जाती है, जिसका विवरण अगले अध्याय में दिया गया

12. सारांश (Conclusion)

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि पुस्तक चयन एक निरंतर प्रक्रिया है | पुस्तकों के अथाह सागर में से आवश्यकतानुसार वस्तुएं खोजने के समान यह कार्य जितना सुलभ दिखता है, उतना ही दुर्लभ कार्य है । पाठकों की आवश्यकताएं जानने हेतु पुस्तकों के साथ-साथ पाठकों से भी जीवंत संपर्क बनाये रखना पड़ता है । जहां चयनकर्ता की भूल-चूक पुस्तकालय में बहुत उपयोगी पुस्तकें खरीदने से वंचित करा सकती हैं, वहीं जरा-सी लापरवाही खराब पुस्तकों को खरीद भी सकती है । पुस्तक विक्रेता द्वारा अतिरिक्त कमीशन का लालच देकर अनुपयोगी पुस्तकों को बेचना उनके व्यवसाय का एक भाग है । बिना किसी लालच, निष्पक्ष रूप से किया गया चयन एक ओर अधिकतम पाठकों को संतुष्टि प्रदान करेगा ही, दूसरी ओर इससे पुस्तकालयाध्यक्ष को भी आत्म-संतुष्टि मिलेगी । यदि हमारे पुस्तकालय अच्छी सेवा द्वारा पाठकों का मन जीत लेते हैं तो उसका दूरगामी प्रभाव पुस्तकालयों के अधिक विकास पर अवश्य पड़ेगा । अत: पुस्तक चयन न केवल आज की आवश्यकता है, वरन कल का मुख्य स्तंभ भी है।

13. अभ्यासार्थ प्रश्न 

1. किसी साधारण एवं सस्ती पुस्तक की अनेक प्रतियों में से एक प्रामाणिक, स्तरीय, मूल्यवान पुस्तक की एक प्रति खरीदना अधिक उपयोगी है । इस कथन से आप कहां तक सहमत हैं?
2. मांग के पुस्तक चयन सिद्धांत को स्पष्ट कीजिये ।।
3. इयूई के पुस्तक चयन सिद्धांत की 'अधिकतम पाठकों के लिये न्यूनतम मूल्य पर सर्वोत्तम पुस्तक' की विवेचना कीजिये ।
4. "प्रत्येक पुस्तक को पाठक तथा प्रत्येक पाठक को पुस्तक मिले" के सिद्धांत का पुस्तक चयन में महत्व बताइये।
5. रंगनाथन के पांच सूत्रों के आधार पर पुस्तक चयन के सिद्धांतों की विवेचना कीजिये ।
6. 'उचित समय पर उचित पाठक को उचित पुस्तक मिले'- सिद्धांत की व्याख्या कीजिये ।
7. पुस्तक-चयन के विभिन्न सिद्धांतों का संक्षेप में वर्णन कीजिये ।
8. पुस्तक चयन में पाठकों की आवश्यकताओं एवं सुझावों को किस प्रकार ध्यान में रखना आवश्यक है' समझाइये ।।
9. पुस्तक चयन प्रक्रिया को समझाइये ।
10. पुस्तक चयन के प्रमुख स्रोतों को बताइये ।
14. विस्तृत अध्ययनार्थ ग्रन्थ सूची ।
1. अग्रवाल, श्याम सुंदर, पुस्तकालय संचालन तथा प्रशासन, आगरा, श्रीराम मेहरा, 1976। 2. तिवारी, भास्कर नाथ, पुस्तक चयन सिद्धांत और विधि, वाराणसी, हिन्दी प्रचारक
पुस्तकालय, 1962 3. शर्मा चंद्रकांत, पुस्तक चयन एवं रचना, इलाहाबाद, साहित्य भवन, 1975।। 4. शास्त्री, द्वारका प्रसाद, पुस्तक चयन एवं संदर्भ सेवा, इलाहाबाद, साहित्य भवन, 1976 5. Mittal, R.L., Library book selection Ed. 2. New Delhi; Metropoliton 6. Ranganathan, S.R., Library book selection ed. 2. New Delhi; Asia,
1996

इकाई - 7 : पुस्तक चयन के विभिन्न स्रोत एवं उनकी महत्ता (Different Types of Books Selection Tools and their Importance) 

उद्देश्य 1. विभिन्न प्रकार की सूचना सामग्रियों के उत्पादक/प्रकाशक एजेन्सियों द्वारा कौन-कौनसी
सूचना सामग्रियों का प्रकाशन/उत्पादन होता है, की जानकारी देना, 2. मुद्रित एवं अमुद्रित सामग्रियों के लिए प्रमुख चयन स्रोतों की पहचान करना एवं उनके
बीच अन्तर को स्पष्ट करना, 3. विभिन्न प्रकार के चयन स्रोतों की विशेषता, उपयोगिता एवं महत्ता को समझाना, 4. चयन स्रोतों का उपयोग करना एवं उनके आधार पर उत्तम मुद्रित एवं अमुद्रित
सामग्रियों का चयन करने की जानकारी देना ।। संरचना
1. विषय प्रवेश 2. पुस्तक चयन का अर्थ 3. सूचना सामग्री के प्रकाशक एवं उनके प्रकाशक 4. पुस्तक चयन के स्रोत 5. अन्य मुद्रित सामग्रियों के चयन स्रोत 6. अमुद्रित सामग्रियों हेतु चयन स्रोत 7. अमुद्रित सामग्रियों के उपकरण हेतु चयन स्रोत 8. सारांश 9. अभ्यासार्थ प्रश्न
10. विस्तृत अध्ययनार्थ ग्रन्थ सूची ।

1. विषय प्रवेश

पुस्तकालय का एक महत्वपूर्ण कार्य संग्रह विकास (Collection Development) करना है । पाठकों की आवश्यकता की पूर्ति हेतु पुस्तकालय अनेक प्रकार की मुद्रित एवं अमुद्रित सामग्रियों का चयन करके उसे क्रय करता है या फिर किसी अन्य माध्यम से उसे प्राप्त करता है । इन सामग्रियों के चयन हेतु विभिन्न प्रकार के चयन स्रोत होते हैं । इन चयन स्रोतों में प्रलेखों के बारे में महत्वपूर्ण कथात्मक सूचनाएं (Bibliographical Information होती हैं । जिनके आधार पर पुस्तकालय उत्तम प्रलेखों का चयन कर सकता है । अत: पुस्तकालयाध्यक्ष को संग्रह विकास के लिए इन स्रोतों के बारे में जानकारी होनी चाहिए ।
इस इकाई में आपको पुस्तक चयन का अर्थ, सूचना सामग्रियों के प्रकाशन/उत्पादक विभिन्न प्रकार के मुद्रित एवं अमुद्रित सामग्रियों के लिये चयन स्रोत एवं इन स्रोतों की विशेषताएं इत्यादि के बारे में जानकारी उपलब्ध करवायी गयी है ।।

2. पुस्तक चयन का अर्थ (Meaning of Book Selection)

पाठ्य सामग्री का चयन सामान्य रूप से पाठक की आवश्यकता की पूर्ति एवं पुस्तकालय के संग्रह में वृद्धि करने के लिए किया जाता है । विभिन्न स्तर एव रूचि के पाठकों की बौद्धिक आवश्यकता हेतु विभिन्न विषयों से सम्बंधित उपयोगी पाठ्य सामग्री का चयन पुस्तकालय के लिए अनिवार्य है । पुस्तकालय सेवा की सफलता और असफलता मुख्य रूप से विभिन्न प्रकार के मुद्रित एवं अमुद्रित पाठ्य सूचना सामग्रियों पर ही निर्भर होती है । पुस्तक चयन के विभिन्न सिद्धान्तों को विस्तार में इकाई 6 में आपने पढ़ा है । 

डूरी का सिद्धान्त (Drury's theory)

April 17, 2019 0
डूरी का सिद्धान्त (Drury's theory)

डूरी का सिद्धान्त (Drury's theory)

डूरी महोदय ने भी पुस्तक-चयन का सिद्धान्त सन् 1930 में प्रतिपादित किया । उनका सिद्धान्त है "उचित समय पर उचित पाठक को उचित पुस्तक प्रदान करना ।" (Right Book to the Right Readers at Right Time) उनके अनुसार उचित पुस्तक का अर्थ है वह पुस्तक जो पाठकों, काल व समुदाय को देखते हुए उचित हो । वह पुस्तक जिन पर अच्छी पुस्तक-समीक्षा प्रकाशित की गई हो तथा जिनका उपयोग पुस्तकालय में वांछित हो "उचित पुस्तक" है । सभी पुस्तकें प्रत्येक पुस्तकालय में उचित नहीं होती अत: पुस्तकालय की आवश्यकताओं के अनुरूप उचित पुस्तकों का ही चयन किया जाना चाहिए । "उचित पाठक' का अर्थ है पाठकों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर पुस्तक का चयन किया जाना | पाठकों रूचि व क्रिया-कलापों को ध्यान में रखकर पुस्तक-चयन किया जाना आवश्यक है । "उचित समय" का अभिप्राय है कि पुस्तक आवश्यकता होने पर शीघ्रातिशीघ्र प्रदान की जाय । उदाहरणार्थ - ग्रीष्मावकाश में कहानियां आदि उपलब्ध न कराने पर यदि परीक्षा समय पर प्रदान की जायगी तो वह उचित समय नहीं होगा । अत: यह आवश्यक है कि भविष्य में संभावित आवश्यकताओं को समझ कर पुस्तक-चयन किया जाये ।

3.3 रंगनाथन का सिद्धांत (Ranganathan's Principles)

डॉ. एस.आर. रंगनाथन ने अपनी पुस्तक में पुस्तक चयन की विवेचना पांच सूत्रों के आधार पर की है, जिसका सार-संक्षेप इस प्रकार है| 1 पुस्तकें उपयोग के लिये हैं (Books are for Use) पुस्तकों में लेखक के विचारों का संग्रह होता है । पुस्तकालय इन्हीं विचारों का आदान प्रदान है । अत: ऐसी पुस्तकों का चयन किया जाना चाहिये, जिनका अधिकतम उपयोग हो । स्पष्ट विचारों से युक्त सरल भाषा में लिखी पुस्तकों का चयन इस हेतु किया जाना चाहिए ।
2 प्रत्येक पाठक को उसकी पुस्तक मिले (Every reader his/her book) वितीय सूत्र के अनुसार पुस्तक-चयन पाठकों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए
ऐसी कोई पुस्तक न खरीदी जाय, जो कम पढ़ी जाय । इस हेतु पाठकों के सुझावों को पुस्तक चयन में महत्व दिया जाना चाहिए ।
3 प्रत्येक पुस्तक को उसका पाठक मिले (Every book its Reader) तृतीय सूत्र के अनुसार ऐसी पुस्तकें ही खरीदी जाएं, जिनको पढ़ने के लिये पाठक लालायित हो । यदि कोई पुस्तक पुस्तकालय में अनुपयोगी पड़ी रहे तो वह मृत- धन के समान है । इस हेतु पाठकों की रूचि, भाषा, स्तर आदि को ध्यान में रखकर पुस्तक-चयन किया जाना चाहिए । |
4 पाठकों का समय बचे (Save the time of Reader) चतुर्थ नियम के अनुसार पाठकों का बहुमूल्य समय व्यर्थ नहीं जाना चाहिए । अर्थात पुस्तक चयन करते समय ऐसी पुस्तकें खरीदनी चाहिए, जिससे कम से कम समय में अधिकतम जानकारी प्राप्त की जा सके । संदर्भ-पुस्तकें, विश्वकोश आदि का चयन इस हेतु अवश्य करना चाहिए । |
5 पुस्तकालय वर्धनशील संस्था है (Library is आ growing organism) पंचम सूत्र के दूरगामी प्रभावी पुस्तक चयन पर पड़ते है पुस्तक संख्या बढ़ने से अधिक स्थान व कर्मचारियों की आवश्यकता पड़ती है । अत: पुस्तकें अनुपयोगी न पड़ी रहें, वरन उनका उपयोग होता रहे । बेकार, कटी-फटी, पुराने संस्करण आदि पुस्तकों को पुस्तकालय से निकाल दें या अलग संग्रह करें | नवीन संस्करण तभी खरीदे जाय जब तक उनमें बहुत अधिक तथ्यपूर्ण व नवीन जानकारी न जोड़ी गई हो । पाठ्य-पुस्तकों को छोड़कर अन्य पुस्तकों की अधिक प्रतियां बहुत आवश्यकता पड़ने पर ही खरीदी जायें ।

3.4 मांग-पूर्ति का सिद्धांत (Demand-Supply Theory)

एल.आर. मैकॉल्विन ने अत्यंत महत्वपूर्ण मांग-पूर्ति का सिद्धांत पुस्तक चयन हेतु प्रतिपादित किया है । उनके अनुसार जब तक पुस्तकें उपयोगी सिद्ध न हों, उनका महत्व एक छपे हुए कागज से ज्यादा कुछ नहीं है । पुस्तकों की उपयोगिता उनकी मांग पर निर्भर करती है।
अर्थशास्त्र का मांग-पूर्ति के सिद्धांत पर वस्तु का मूल्य निर्धारित होता है । पुस्तकालय में मांग-पूर्ति का सिद्धांत पुस्तक की उपयोगिता पर आधारित होता है एवं उसी के आधार पर चयन किया जाना चाहिए ।
अधिक उपयोगी पुस्तक | - अधिक मांग | - अधिक चयन कम उपयोगी पुस्तक | - कम मांग
- कम चयन अनुपयोगी पुस्तक - न्यून मांग
- चयन नहीं पुस्तकों का अधिक मूल्य होने पर भी पूर्ति में बाधा उत्पन्न होती है । यह जरूरी नहीं कि मूल्यवान पुस्तक अधिक उपयोगी होगी | एक से स्तर की दो पुस्तकों का चयन मूल्य पर आधारित होता है | इस सिद्धांत में मांग की पूर्ति पर अधिक बल दिया गया है । अनेकों बार इस मांग तथा पूर्ति में सामंजस्य भी एक समस्या उत्पन्न करती है उदाहरणार्थ- कुंजी आदि की या एक सस्ते उपन्यास की मांग तो बहुत अधिक होती है, परंतु स्तर न्यून होता है । अत: इसकी पूर्ति नहीं की जा सकती । प्राय: यह देखा गया है कि कुछ वर्ग-विशेष की मांग निम्नस्तरीय पुस्तकों की अधिकाधिक हो सकती है । अत: इस सिद्धांत के पालन में पुस्तकालय के स्तर में गिरावट नहीं आने देना चाहिए ।
इस सिद्धान्त को निम्नलिखित तीन स्तंभों पर आधारित किया गया है -
1 घनत्व (volume) : मांग की अधिकता अथवा न्यूनता को घनत्व कहा गया है । जितनी अधिक मांग होगी पुस्तक चयन उतना ही आवश्यक होगा । अत: पुस्तक जिसकी बहुत अधिक पाठकों द्वारा मांग की जाय, आवश्यक रूप से खरीदी जाय । |
2 मूल्य (Value) : यहां मूल्य का अर्थ गुणात्मक मूल्य से है । पुस्तक द्वारा प्रदान किये गये शान, सूचना वृद्धि, रचना शक्ति, प्रोत्साहन तथा उत्साह पुस्तक के गुणात्मक मूल्य है।
जितने अधिक गुण पुस्तक में होंगे, उतनी ही उसकी अधिक मांगें होंगी । अत: गुणात्मक रूप से मूल्यवान पुस्तकों का चयन अवश्य किया जाना चाहिए ।
3 विविधता (Variety) : विविधता पाठकों की भिन्नता के कारण उत्पन्न होती है । सभी पाठक एक सी आदतों मानसिकता, बुद्धि तथा शैक्षिक योग्यता वाले नहीं होते, अत: उनकी मांग भी अलग-अलग होती है । सभी प्रकार के पाठकों की मांग की पूर्ति करने का प्रयास अवश्यक करना चाहिए ।

4 चयनकर्ता के कार्य (Functions of the book selectors)

पुस्तक- चयन के उपरोक्त कारकों एवं सिद्धांतों की पूर्ति हेतु पुस्तक- चयनकर्ता के निम्नलिखित कार्य है:
1. अपनी विद्वता का परिचय देते हुए सर्वोत्तम एवं उपयोगी पुस्तकों की पहचान करें ।
2. चयनकर्ता अपने आपको पुराने व नये लेखकों के विचारों से अवगत रखे एवं उनका अध्ययन कर पुस्तकों का चयन करे । 

Saturday, February 23, 2019

Job opportunities in law librarianship

February 23, 2019 0
Job opportunities in law librarianship

Job opportunities in law librarianship


331.124 + 026 + 340 = 331.124 102 634 (ii) Job opportunities in international wheat trade
331.1241 + 382.41 + 311 = 331.124 138 241 311 शीर्षक: (i) Economic conditions in Indian during 1970s का मुख्य पक्ष Economic conditions है। इसको 330 Economics में देखने पर 330.9 Economic situation conditions शीर्षक मिल जाता है । अतः 330.91-.99 Geographical treatment [of economic situation and conditions] निर्देश: Add "Areas" notation 1-9 from Table 2 to base number 330.9...; then to the result add historical period number from appropriate subdivision of 930-990.....
उपरोक्त निर्देशानुसार आधार संख्या 330.9 [Economic conditions] India [in Table 2]
954.05 [India] 1971=330.9 + 54 + 05 =330.954 05 अत: शीर्षक Economic conditions in India during 1970s की वर्ग संख्या 330.954 05 होगी। इसी प्रकार, निम्नलिखित बहुसंश्लेषित वर्ग संख्याओं का निर्माण किया जा सकता है: (i) Economic conditions in France in 20th century
330.9 + 44 + 08 = 330.944 08 (ii) Economic conditions in Great Britain during 1970s
330.9 + 41 + 0857 = 330.941 085 7 शीर्षक :

(i) Treatment of muscular diseases in old age by Acupuncture 

की वर्ग संख्या का निर्माण निम्नलिखित तरीके से करेंगे ।
618.97 Geriatrics[i.e. diseases of old persons] शीर्षक के अंतर्गत विभिन्न उपवर्गों व प्रावधानों का अवलोकन करने पर निम्नलिखित प्रावधान मिल जाता है :
आधार संख्या 618.976 - 978 Specific diseases 618.97
निर्देश : Add to base number 618.97 the numbers following 61 in 616-618... वर्ग संख्या श्रृंखला 616-618 में Muscular diseases की वर्ग संख्या मिल जाती है । 616.74 [Diseases] * Of muscular यह शीर्षक तारांकित * है अत: पृष्ठ के नीचे दी गई पाद टिप्पणी Add as instructed under 616.1 - 616.9" के अनुसार हम निम्नलिखित सामूहिक 'योजक' निर्देशों पर पहुंच जाते हैं। ... add to notation for each item identified by * as follows ...... 062 - 069 Other therapies Add to 06 the number following 615.8 in 615.82 - 615.89... अब वर्ग संख्या श्रृंखला 615.82 - 615.89 के अंतर्गत विभिन्न वर्ग संख्याओं को देखने पर Acupuncture की निम्नलिखित वर्ग संख्या मिल जीती है: 615.892 Acupuncture = 618.97 + 674 + 06 +92 = 618.976 740 692 3ta: gitech Treatment of muscular diseases in old age by Acupunture की संख्या 618.976 740 692 इसी प्रकार, निम्नलिखित बहु संश्लेषित वर्ग संख्याओं का निर्माण किया जा सकता है।

(i) Electrotherapy of children's bone diseases

 618.92 + 71 + 06 + 45 = 618.927 106 45 (ii) Chemical diagnosis of blood related diseases in old age
618.97 + 615 + 07 + 56 = 618.976 150 756 शीर्षक : (i) Death statistics due to lung tubercuiosis की वर्ग संख्या निर्माण हेतु निम्नलिखित स्तरों पर संश्लेषण की आवश्यकता होगी :
312.2 [Statistics] on death शीर्षक के अंतर्गत विभिन्न उपवर्गों व प्रावधानों को देखने पर निम्नलिखित प्रावधान मिल जाता है :
312.261 -.269 [Deaths caused by] Specific diseases संख्या 312.26 निर्देश : Add to base number312.26 the number following 616 in 616.1 - 616.9.... 267 आधार वर्ग संख्या श्रृंखला 616.1-616.9 के अंतर्गत Tuberculosis शीर्षक | मिल जाता है । 616.995 Tuberculosis
Aader : Add to base number 616.995 the number following 611 in 611.1 - 611.9.. निर्देशानुसार वर्ग संख्या श्रृंखला 611.1 - 611.9 के अंतर्गत देखने पर
lung शीर्षक मिल जाता है। 611.24 Lungs = 312.26 + 995 + 24 = 312.269 952 4 अत: शीर्षक Death statistics due to lung tuberculosis की वर्ग संख्या 312.269 952 4 होगी । इसी प्रकार, निम्नलिखित बहु संश्लेषित वर्ग संख्याओं का निर्माण किया जा सकता है:
(i) Death statistics due to lung cancer
| 312.26 + 994 +24 = 312.269 942 4 (ii) Death statistics due to diseases of frigid climate
312.26 + 988 + 1 = 312.269 881 शीर्षक : (i) Ministry of Social welfare, Government of India की वर्ग संख्या निर्माण के लिए निम्नलिखित चरण होंगे।
354.3 - .9 Specific central governments other than those of United States आधार संख्या निर्देश : Add "Areas" notation 3-9 from Table 2 to 354 base number 354...., then add further as follow : उपरोक्त निर्देशानुसार देखने पर Table 2 में India शीर्षक मिल जाता है। India [in Table 2] अब निर्देशों की कड़ी में दिए गए विभिन्न निर्देशों में से निम्नलिखित प्रासंगिक निर्देश का चयन किया जा सकता है : 06 Specific executive departments and ministries of cabinet rank Add to 06 the numbers following 351.0
in 351.01 - 351.08.. इस निर्देशानुसार वर्ग संख्या शृंखला 351.01-351.08 के अवलोकन पर निम्नलिखित प्रासंगिक उपवर्ग मिल जाता है: 351.07 - .08

Other departments Parcher : Add to base number 

351.0 the numbers following 351 in 351.7 - 351.8 ... अब वर्ग संख्या श्रृंखला 351.7 - 351.8 के अवलोकन पर Social welfare शीर्षक मिल जाता है।
Social welfare and corrections = 354 + 54 + 06 + 84 = 354.540 684 अत: शीर्षक Ministry of Social welfare, Government of India को वर्ग संख्या 354 540 684 होगी। इसी प्रकार, निम्नलिखित बहु संश्लेषित वर्ग संख्याओं का निर्माण किया सकता है: | (i) Department of Libraries, Government of Karnataka
| 354 + 5487 + 06 + 852 = 354.548 706 852 (ii) Cabinet of Madhya Pradesh |
| 354 + 543 + 0 +4 = 354, 543 04
शीर्षक : (i) Rats as wheat pests की वर्ग संख्या निर्माण के विभिन्न चरणों को निम्नलिखित प्रकार से दर्शाया जा सकता है: 633.11 *Wheat
इस तारांकित ' शीर्षक की वर्ग संख्या के आगे अन्य पक्षों को जोड़ने के लिए सामूहिक निर्देश उसी पृष्ठ के ऊपर वाले भाग में दिए गए हैं। Archer : Add to the notation for each term identified by * as follow : 9 Injuries , diseases, pests Add to 9 the numbers following 632 in 632.1 - 632.9..... निर्देशानुसार वर्ग संख्या श्रृंखला 632.1 -632.9 के अंतर्गत देखने पर Animals pests शीर्षक मिल जाता है। 632.6 Animals pests
निर्देश : Add to base number 632.6 the numbers following 59 in 592 - 599 ... वर्ग संख्या श्रृंखला 592-599 में मुख्यतया जन्तुओं के वैज्ञानिक नाम दिए गए हैं । साथ ही, कोष्ठक में सामान्य नाम भी दिए हुए है। किन्तु
मुश्किल होने पर सापेक्षिक अनुक्रमणिका का सहारा लिया जा सकता है। 599.3233 Myomorpha [Rats]
269 = 633.11 + 9 + 6 +93233 = 633.119 693 233 अतः शीर्षक Rats as wheat pests की वर्ग संख्या 633.119 693 233 होगी इसी प्रकार, निम्नलिखित बहु संश्लेषित वर्ग संख्याओं का निर्माण किया जा सकता है: (i) Monkey as apple pests 634.11 + 9 + 6 + 982 = 634.119 698 2 

Saturday, February 2, 2019

Encyclopaedia of Ancient, Medieval and oriental Philosophy.

February 02, 2019 0
Encyclopaedia of Ancient, Medieval and oriental Philosophy.

Encyclopaedia of Ancient, Medieval and oriental Philosophy. 

जाता। दशमलव में वर्गाकार को दो उपविभाजनों में से किसी एक को जोड़ने का निर्देश है। वर्गाकार की सहायता के लिए सारणी से पहले एक प्राथमिकता सारणी दी गई है। जिसको देखकर वर्गाकार यह तय कर सकता है कि अगर किसी शीर्षक में दो मानक उपविभाजनों का वर्णन हो तो वर्गाकार को किस मानक उपविभाजन को प्राथमिकता
देनी चाहिए। 5. सारणी 1 में दिए मानक उपविभाजनों के प्रसार का प्रावधान है। जिन्हें कि सारणी 2-7
की सहायता से और यहां तक कि कहीं-कहीं अनुसूचियों की सहायता से भी सतत् किया
जा सकता है। 10. अभ्यासार्थ प्रश्न निम्नलिखित गन्थों के वर्गीक बनाइये _
1. 2. . 3. Study of classical Greek Language. 4. Experimental Research in Inorganic Chemistry of rare earth
elements. 5. Manual of Structural crystallography. 6. Surveys and appraisals of causes of physical differences of human
races. 7. Teaching of Plant psychology. 8. Value of Trees. 9. Journal of Economic Development and Growth. 10. Encyclopaedia of Fashion 11. Electronic data processing in extractive metallurgy. 12. Workbook of Algebra. 13. Research in Applied Linguistics. 14. Methodology of Sociology. 15. Descriptive research on field crops. 16. Study of political parties of Australia. 17. Study of Sanskrit literature. 18. Communication in Social sciences.
199
19. Techniques and equipment for petrology. 20. Journal of Higher Education. 21. Courses in differential and integral Geometry. 22. Dictionary of Arts. 23. Industrial psychology for managers. 24. History of Western Hindi Literatures. 25. Alcoholism among oriyas. 26. Research in Insect Microphysiology. 27. Correspondence courses in Law. 28. Operations research in Revenue administration. 29. Study of vanishing animals. 30. Manual of Analytical Biochemistry.

Descriptive Research in the psychology of exceptional children

इकाई-12 : सारणी - 2 : भौगोलिक उपविभाजन का प्रयोग उद्देश्य
1. सारणी 2 : भौगोलिक उपविभाजनों की व्याख्या करना, 2. सापेक्षिक अनुक्रमणिका से भौगोलिक उपविभाजन अंकन खोजने की विधि को समझाना,
3. । संरचना/ विषय प्रवेश
1. विषय प्रवेश 2. इयूई दशमलव वर्गीकरण पद्धति में भौगोलिक उपविभाजन 3. सापेक्षिक अनुक्रमणिका से भौगोलिक उपविभाजन अंकन ढूंढने की विधि 4. भौगोलिक उपविभाजनों के प्रयोग की विधि
4.1 निर्देशानुसार भौगोलिक उपविभाजन का प्रयोग 4.2 बिना निर्देश के भौगोलिक उपविभाजन का प्रयोग 4.3 दो देशों के मध्य संबंध 4.4 भौगोलिक उपविभाजन सारणी के - 11 - 19 तक के अंकनों व -3 से -9 तक
के अंकनों का संयोजन 4.5 4.5 अन्य सारणियों के अंकन के साथ भौगोलिक उपविभाजन सारणी के अंकन
का प्रयोग 5. सारांश 6. अभ्यासार्थ प्रश्न 7. अभ्यास के लिये शीर्षकों के उत्तर
8. विस्तृत अध्ययनार्थ ग्रंथसूची 1. विषय प्रवेश
इयूई दशमलव वर्गीकरण में प्रयुक्त दवितीय सारणी भौगोलिक उपविभाजन का प्रयोग है। इस सारणी में स्थान से संबंधित विभिन्न प्रकार के क्षेत्रों का उल्लेख है। इस सूची का प्रयोग द्वितीय खण्ड में वर्णित अनुसूचियों में 001 से 999 तक किसी भी वर्गीक के साथ किया जा सकता है, चाहे निर्देश मिले या नहीं। इस अध्याय में आपको विभिन्न प्रकार से इस सारणी का उदाहरण सहित उपयोग करना बताया है।

2. इयूई दशमलव वर्गीकरण पद्धति में भौगोलिक उपविभाजन

इयूई दशमलव वर्गीकरण खण्ड 1 के पृष्ठ 14 से 386 पर भौगोलिक उपविभाजनों की एक विस्तृत सारणी दी गई है। इस सारणी का उपयोग भौगोलिक क्षेत्रों के अंकन को वर्ग संख्याओं के साथ जोड़ने के लिये किया जाता है, जैसे महाद्वीप (Continents), देश (Country), प्रान्त (State), शहर (City), गांव (Village), समुद्री सीमायें आदि। लगभग सभी विषयों व वस्तुओं का अध्ययन या वर्णन विभिन्न प्रकार के भौगोलिक क्षेत्रों के संदर्भ में किया 201
जा सकता है. जैसे भारत की विदेश नीति, जापान का विदेशी व्यापार, राजस्थान विधान सभा, चीन में उच्च शिक्षा आदि।
भौगोलिक उपविभाजन सारणी दशमलव वर्गीकरण खण्ड 1 में दी गई सातों सहायक सारणियों में सबसे बड़ी सारणी है। इण्डो-अरेबिक अंकों (Indo-Arabic numerals) के सीमित आधार के कारण सम्पूर्ण सारणी को 9 भागों में भौगोलिक विभक्त किया गया है। अंकन -1 से -19 का उपयोग निम्नलिखित प्रकार के विभिन्न सामान्य क्षेत्रों (General areas) के लिये किया गया है।
1. कटिबन्धीय प्रदेश (Zonal regions) जैसे उष्ण कटिबन्ध, शीत कटिबन्ध आदि। 2. भूमि और भूमि के आकार पर आधारित (Land and land forms) जैसे द्वीप, पहाड़,
पठार, समतल क्षेत्र, सीमान्त क्षेत्र आदि। 3. वनस्पति के आधार पर (Types of vegetation) जैसे वन, घास वाली भूमि, रेगिस्तान आदि। 4. वायु व जल की (Air and water) सीमाओं पर आधारित प्रदेश, जैसे वायुमण्डल,
अटलांटिक महासागर, प्रशान्त महासागर, हिन्द महासागर आदि। 5. सामाजिक, राजनैतिक आर्थिक, धार्मिक व प्राकृतिक तत्वों पर आधारित प्रदेश जैसे ब्रिटिश साम्राज्य, रोमन साम्राज्य, विकसित देश, विकासशील देश, शहरी क्षेत्र, अर्द्ध शहरी क्षेत्र, ग्रामीण क्षेत्र, मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र, हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र आदि। 6. अन्य प्रकार के लौकिक क्षेत्र (Other kinds of terrestrial regions) जैसे पश्चिमी गोलार्द्ध। 7. अन्तरिक्ष (Space)। इस प्रकार के कुछ भौगोलिक क्षेत्रों की वर्ग संख्यायें निम्नानुसार है:

भौगोलिक उपविभाजनों के प्रयोग की जानकारी देना

- 11 Frigid zones (शीत कटिबन्ध) - 12 Temperate zones (शीतोष्ण कटिबन्ध) - 13 Torrid zone (उष्ण कटिबन्ध) - 143 Mountains etc. (पहाड़ आदि) - 162 Oceans and seas (महासागर व समुद्र आदि) - 17 Soci-economic regions (सामाजिक व आर्थिक) - 1717 Communist bloc (साम्यवादी गुट) - 1734 Rural regions(ग्रामीण क्षेत्र) - 1811 Eastern regions (पूर्व क्षेत्र) - 1812Western regions (पश्चिमी क्षेत्र)
अंकन -3 से -9 का प्रयोग महाद्वीपों और देशों के लिए किया गया है। भौगोलिक अंकन -3 प्राचीन विश्व को आवंटित किया गया है तथा उसको निम्नलिखित भागों में बांटा गया
202
- 3 The acient world (प्राचीन विश्व) - 31 China(चीन) - 32 Egypt (मिश्र) - 33Palestine (फिलीस्तीन)
34India (भारत) 35Mesopotamia and Iranian Plateau (मेसोपोटामिया एवं इरानी पठार) 36Europe North & West of Italian Peninsula (उत्तरी यूरोप एवं पश्चिमी इटेलियन प्रायद्वीप) 37 Italian Peninsula & adjacent territories (इटेलियन प्रायद्वीप एवं समीपस्थ
क्षेत्र) - 38 Greece (ग्रीस) - 39 Other parts of ancient territories (प्राचीन विश्व के अन्य भाग)
भौगोलिक अंकन -4 से -9 तक का प्रयोग आधुनिक विश्व के भौगोलिक क्षेत्रों को दर्शाने के लिए किया गया है। आधुनिक विश्व के क्षेत्रों को निम्नलिखित महाद्वीपों में बांटा गया है :
- 4 Europe (यूरोप) - 5 Asia (एशिया) - 6 Africa (अफ्रीका)
7 North America (उत्तरी अमेरिका) - 8 South America (दक्षिण अमेरिका) - 9 Other parts of the world (विश्व के अन्य भाग) प्रत्येक महाद्वीप को नौ प्रमुख देशों में बाटा गया है। उदाहरणार्थ अंकन को निम्नलिखित देशों में बांटा गया है:
- 51 China and adjacent (चीन व समीपस्थ क्षेत्र) - 52 Japan and adjacent islands (जापान व समीपस्थ द्वीप)
53 Arbian Peninsula and adjacent areas (अरेबियन प्रायद्वीप एवं समीपस्थ क्षेत्र) 54 South Asia, India (दक्षिणी एशिया, भारत) 55 Iran (Persia) (इरान, फारस) 56 Middle East (Near East) (मध्य पश्चिमी क्षेत्र)
57 Siberia (Asiatic Russia) (साइबेरिया (एशियाटिक रूस)) - 58 Central Asia (मध्य एशिया) - 59 South East Asia (दक्षिणी - पूर्वी एशिया)

Saturday, January 26, 2019

पांच मूलभूत श्रेणियों की विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिये कोर्स

January 26, 2019 0
पांच मूलभूत श्रेणियों की विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिये कोर्स

पांच मूलभूत श्रेणियों की विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिये कोर्स

(Inverted Comma) नोट :- पांच मूलभूत श्रेणियों की विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिये कोर्स 2A इकाई-मूलभूत श्रेणियों की अवधारणा का अवलोकन कीजिए। 5.1 आवर्तन एवं स्तर आवर्तन (Rounds)
प्रायोगिक दृष्टिकोण से अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि [P], [M] व [E] का उसी विषय में एक से अधिक बार प्रयोग हो सकता है; अर्थात् इनका एक से अधिक बार आवर्तन। इनके विभिन्न आवर्तनों को पक्ष-परिसूत्रों में निम्न प्रकार के संक्षिप्त प्रतीकों द्वारा व्यक्त किया जाता है:मूलभूत श्रेणियां प्रथम आवर्तन | दवितीय आवर्तन तृतीय आवर्तन
[3E] नोट - [S] व [T] के आवर्तन नहीं होते।
[P] एवं [M] का प्रथम आवर्तन [E] के पूर्व, वितीय आवर्तन [E] के प्रथम आवर्तन के बाद, तृतीय आवर्तन [2E] के बाद होता है। प्रायः सभी पक्ष परिसूत्रों में [E] के बाद [2P] तथा [2E] के बाद [3P] को एक यौगिक के रूप में प्रयोग में लाया जाता है, अर्थात् [E] Cum[2P] या [E] [2P] एवं [2E] Cum[3P] या [2E][3P] के रूप में। इस प्रकार पक्ष परिसूत्र एवं वर्गीक में इनको अलग नहीं दिखाया जाता है। उदाहरण -
शीर्षक - X-ray treatment of throat cancer. वर्गीक - L 177 : 47257 : 6253 पक्ष परिसूत्र - L[P] : [E] [2P] : [2E] [3P]
इस पक्ष-परिसूत्र के अनुसार उपर्युक्त वर्गीक में [P] एवं [E] के आवर्तन निम्नलिखित प्रकार से दिखाई देते है;
L[BC] = Medicine (मुख्य वर्ग) 177 [P]
= Throat, [P] का प्रथम आवर्तन 4 [E] = Disease, [E] का प्रथम आवर्तन 725 [2] = Cancer, [P] का दूसरा आवर्तन

6[2E] = Treatment, [E] का दूसरा आवर्तन

253 [3P] = X-ray, [P] का तीसरा आवर्तन, यहां [E] के साथ [2P] एवं [2E] के साथ [3P] जुड़ा हुआ है। मुख्य वर्ग L, J, Y आदि में इस प्रकार के आवर्तन पाये जाते हैं। स्तर (Levels)
| [P] एवं [M] का एक से अधिक बार प्रयोग हो सकता है, इसे स्तर के नाम से जाना जाता है। [s] एवं [T] के भी स्तर होते है। इन सभी स्तरों को निम्न प्रकार के संक्षिप्त प्रतीकों द्वारा व्यक्त किया जाता है
[P] के स्तर [P1], [P2]), [P3], [P4] [M] के स्तर [M1], [M2] आदि [S] के स्तर [S1], [S2]), [S3], [S4]
[T] के स्तर [T1], [T2] Hey gof a= Generalia Bibliography, O= Literature, P= Linguistics, N= Fine Arts, Z= Law में [P] पक्ष का एक से अधिक बार प्रयोग हुआ है:उदाहरण
शीर्षक- Injunction in ex parte judgment of Civil Cases in Indian Law. यहां मुख्य वर्ग Z=Law है। पक्ष परिसूत्र Z [P], [P2]), [P3], [P4] वर्गीक Z44, 71, 73, 5
पक्ष परिसूत्र के अनुसार उपर्युक्त वर्गीक में [P] पक्ष का निम्न चार स्तर पर प्रयोग किया गया है।
Z [BC] = Law (मुख्य वर्ग) 44 [P1] = Indian (भारतीय समुदाय) [P] का प्रथम स्तर 71 [P2] = Civil action, [P] का दूसरा स्तर, 73 [P3] = Ex Parte Judgment, [P] का तीसरा स्तर,
5 [P4] = Injunction, [P] का चौथा स्तर, 6. वैश्लेषी-संश्लेषणात्मक प्रक्रिया
विबिन्दु वर्गीकरण पद्धति एक वैश्लेषी-संश्लेषणात्मक वर्गीकरण पद्धति है। इस पद्धति में विषयों के पूर्वनिर्मित वर्गीक उपलब्ध नहीं है। यहां विभिन्न विषयों के अन्तर्गत विभिन्न पक्षों के लिये पृथक-पृथक मानक इकाइयों को व्यक्त करने वाली अनुसूचियां दी गई हैं, अर्थात [P] पक्ष के अन्तर्गत व्यक्तित्व पक्ष की, [M] के अन्तर्गत पदार्थ पक्ष की, [E] के अन्तर्गत ऊर्जा पक्ष की अनुसूचियां। विभिन्न इकाइयों की एकल संख्यायें संबंधित पक्षों से लेकर विभिन्न विषयों के वर्गीक बनाये जाते हैं। वर्गीक बनाने की प्रक्रिया में निम्नलिखित चरण अपनाये जाते हैं:

(क) विशिष्ट विषय का उसकी संघटक इकाईयों (पदों) में विश्लेषण करना,

(ख) इकाइयों (पदों) की पहचान करके उनके पक्ष का निर्धारण करना (ग) पक्षों का निर्धारण करने के बाद उनका पक्ष-परिसूत्र के अनुसार कम निर्धारण करना, (घ) प्रत्येक इकाई (पद) को अनुसूची में निर्धारित एकल संख्या प्रदान करना, (ङ) प्रत्येक पक्ष का सांकेतिक चिन्ह लगाकर विभिन्न एकल संख्याओं का संश्लेषण करना।
इस प्रक्रिया को समझाने के लिये निम्नलिखित उदाहरण प्रस्तुत किये जा रहे हैं :शीर्षक : 19 वीं शताब्दी में यूरोप के राष्ट्रीय पुस्तकालयों में पांडुलिपियों का सूचीकरण
Cataloguing of manuscripts in National Libraries of Europe
during 19th Century इस आख्या से स्पष्ट है कि यह ग्रन्थ Library Science मुख्य वर्ग से संबंधित है। इस प्रकार इसका मुख्य वर्ग Library Science है।
(क) आख्या के संघटक पद : Cataloguing, Manuscripts, National Libraries, Europe, 19th Century.
(ख) संघटक पदों की पहचान एवं मूलभूत श्रेणी का निर्धारण : Cataloguing प्रक्रिया है अत: यह Energy [E] पक्ष को सूचित करती है, Manuscripts पदार्थ है अत: यह Matter [M] पक्ष को सूचित करता है; National Libraries एक प्रकार का ग्रन्थालय है अत: यह Personality [P] पक्ष को सूचित करता है; Europe भूभाग है अत: यह Space [S] पक्ष को सूचित करता है 19th Century समय है अत: Time [T] पक्ष का द्योतक है। । (ग) मुख्य वर्ग Library Science का पक्ष परिसूत्र है- 2 [P]; [M]; [E][2P] तथा Space व Time सर्वसामान्य पक्ष है अत: इस पक्ष परिसूत्र के अनुसार आख्या के पदों का क्रम इस प्रकार है:
Library Science (MC). National Library [P]. Manuscripts [M]. Cataloguing [E]. Europe [S]. 19th Century [T].

(घ) अनुसूचियों में निर्धारित एकल संख्या प्रत्येक पद के स्थान पर रखना - 

नोट- 12[M] (मुख्य वर्ग Generalia Bibliography के [P] पक्ष से, तथा 5[S] स्थान एकल अनुसूची से (पृष्ठ 2.8 से 2.17); M[T] काल एकल अनुसूची से (पृष्ठ 2.7) लिया गया है।
। (इ) संकेतक चिन्ह लगाकर एकल संख्याओं का संश्लेषण 213; 12: 55.5 ' M= संश्लेषित वर्गीक
नोट- पक्ष परिसूत्र के अनुसार 2[MC] तथा 13[P] के मध्य Personality का संकेतक चिन्ह नहीं लगाया गया है। यह अपवाद है। शीर्षक : प्रेमचन्द द्वारा रचित गोदान (5 वीं कृति)
Premchand's Godan (5th Work)
21
इस आख्या से स्पष्ट है कि यह ग्रन्थ मुख्य वर्ग Literature से संबंधित है। Godan उपन्यास है, भाषा हिन्दी है, Premchand का जन्म वर्ष 1880 है।
Literature का पक्ष परिसूत्र - O [P1], [P2], [P3], [P4] यहां (MC) = Literature
[P1] = Language [P2] = Form [P3] = Author
[P4] = Work (क) आख्या के संघटक पदः- Premchand (1880)
Godan (Fifth work). Literature. Hindi. Fiction (ख) संघटक पदों की पहचान व मूलभूत श्रेणी :
Premchand (1880) [P3]. Godan (5th work) [P4]. Literature (MC).
Hindi [P1]. Fiction P[2]. (ग) पक्ष परिसूत्र के अनुसार पदों का अनुक्रम :
Literature (MC). Hindi [P1]. Fiction P[2]. Premchand (1880) [P3].
Godan (5th work) [P4]. (घ) प्रत्येक पद की एकल संख्या :
O [MC]. 152[P].[P2].M80[P3].5[P4]

Wednesday, January 23, 2019

पंक्ति (Array) में सहायक अनुक्रम के सिद्धान्त तथा उसका प्रयोग

January 23, 2019 0
पंक्ति (Array) में सहायक अनुक्रम के सिद्धान्त तथा उसका प्रयोग

पंक्ति (Array) में सहायक अनुक्रम के सिद्धान्त तथा उसका प्रयोग

रंगनाथन ने पंक्ति (Array) में सहायक अनुक्रम के लिये आठ सिद्धान्त प्रतिपादित किये हैं तथा उसका प्रयोग सी.सी. में पंक्ति के एकलों को व्यवस्थित करने के लिये किया गया है |
1. परवर्ती काल का सिद्धान्त Principle of Latter-in-Time
2. परवर्ती विकास का सिद्धान्त
Principle of Latter-in-Evolution 3. स्थानीय समीपता का सिद्धान्त
Principle of Spatial Contiguity 4. परिमाण, संख्या या मात्रा का सिद्धान्त Principle of Quantitative Measure 5. जटिलता वृद्धि का सिद्धान्त
Principle of Increasing Complexity 6. प्रामाणिक अनुक्रम का सिद्धान्त
Principle of Canonical Sequence 7. साहित्यिक मांग का सिद्धान्त
Principle of Literary Warrent 8. वर्णानुक्रम का सिद्धान्त
Alphabetical Sequence
103
उपर्युक्त सिद्धान्त के आधार पर व्यवस्थित एकल विचारों व उनके लिये प्रयुक्त अंक यन्त्रवत स्मृति सहायक अंकन की उत्पत्ति करते हैं । रंगनाथन द्वारा प्रतिपादित उपर्युक्त सिद्धान्तों का वर्णन अलग । से अन्य इकाई (Unit) में किया गया है । कुछ उदाहरण निम्न काल अनुक्रम (Time Sequence) से सम्बन्धित उदाहरण
पर्युक्त उदाहरण से स्पष्ट है कि सी.सी. में इस सिद्धान्त का पूर्णतः पालन हुआ है। जबकि डी.डी.सी. एवं यू.डी.सी. में कुछ हद तक इस सिद्धान्त का पालन हुआ है ।
परवर्ती विकास (Evolutionary Sequence) के सिद्धान्त को भी एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है:
सी.सी. व यू.डी.सी. में पूर्ण रूप से इस उपसूत्र का पालन हुआ है । जबकि डी.डी.सी. में ऐसा नहीं हुआ है ।। 6.4 मौलिक समृति सहायक (Seminal Mnemonics)
जब किसी वर्गीकरण पद्धति में किसी एक ही विचार या इससे मिलते जुलते विचार को अभिव्यक्त करने के लिए एक ही प्रकार के अंको का प्रयोग किया जाता है तो उसे मौलिक स्मृति सहायक कहते हैं ।

मौलिक स्मृति सहायक के उपसूत्र (Cannon of Seminal Mnemonics)

इस उपसूत्र के अनुसार 'एक वर्गीकरण पद्धति में मूलसमरूप अवधारणाएँ (seminally Equivalent) चाहे किसी भी विषय में विद्यमान हो, को अभिव्यक्त करने के लिए एक निश्चित अंक का प्रयोग करना चाहिए ।' अर्थात किसी एक धारणा या विचार अथवा उससे मिलते जुलते विचारों का प्रतिनिधित्व सभी विषयों में एक निश्चित अंक द्वारा होना चाहिये,
चाहे इस विचारधारा की अभिव्यक्ति के लिए अलग-अलग विषयों में अलग-अलग प्रकार के पदों (Trems) का प्रयोग क्यों न किया गया हो ।
विबिन्दु वर्गीकरण पद्धति ही एकमात्र पद्धति है जिसमें इस उपसूत्र के अनुरूप ही मौलिक विचारों एवं अवधारणाओं ले अभिव्यक्त किया गया है । उदाहरणार्थ
अंक 3 का प्रयोग अलग-अलग मुख्य वर्गों में अलग-अलग पदों के लिए हुआ है, किन्तु ये सभी पद मौलिक स्तर पर एक ही प्रकार की  इस इकाई में हमने अंकन के अर्थ, परिभाषा, आवश्यकता, कार्य, प्रकार, इत्यादि का अध्ययन किया । हमने एक अच्छे अंकन के गुण तथा स्मरणशीलता का भी विश्लेषण किया ।
अंकन प्रतीकों व चिन्हों की एक ऐसी व्यवस्था है । जिसका प्रयोग प्राकृतिक भाषा के पदों व शब्दों को व्यक्त करने के लिये किया जाता है । अंकन के आधार के लिये विभिन्न प्रजाति के प्रतीकों व चिन्हों का प्रयोग किया जाता है । जैसे- हिन्द-अरबी अंक, रोमन दीर्घ व रोमन लघु अक्षर, ग्रीक अक्षर, गणितीय चिन्ह, विराम चिन्ह इत्यादि । इसी के आधार पर अंकन दो प्रकार के होते है- शुद्ध अंकन व मिश्रित अंकन । पुस्तकालय में पाद्य सामग्री को सहायक अनुक्रम में व्यवस्थित करने के लिए अंकन अत्यन्त आवश्यक हैं । सरलता, संक्षिप्तता, लचीलापन, संश्लेषणात्मकता, अभिव्यंजकता, सापेक्षता आदि अच्छे अंकन के गुण है । इन सभी गुणों पर विस्तार से चर्चा की गयी है | इस इकाई के अन्त में पारिभाषिक शब्दावली अभ्यासार्थ प्रश्न विस्तृत अध्ययन के लिए ग्रन्थ सूची उपलब्ध करवायी गयी है ।

8. पारिभासिक शब्दावली

| प्रथमाक्षरी नाम (Acronym): ऐसा शब्द जिसका निर्माण शब्द के अक्षरों के समूह के प्रथम अक्षर से होता है ।
भिन्नार्थक शब्द (Homonyms) : ऐसे शब्द जिसका अर्थ अलग- अलग हो, किन्तु उसकी वर्तनी एक समान या अलग हो, लेकिन उच्चारण एक ही तरह से होता हो ।
पर्यायवाची शब्द (यनsynonyms): शब्द जिसके कि एक समान या लगभग समझ अर्थ हो ।
प्राकृतिक भाषा (Natural Language): बोल-चाल की सामान्य प्रचलित भाषा । यन्त्रवत् (Mechanical): मशीन के समान शीघ्र कार्य करने का गुण ।
वर्गीकृत (Classifier): किसी वर्गीकरण पद्धति के आधार पर प्रलेखों को वर्गीकृत करने वाला व्यक्ति ।
105
वर्गाचार्य (classifyicanist): किसी वर्गीकरण पद्धति का निर्माण करने वाला व्यक्ति ।
पंक्ति वर्ग (Class in Array): ऐसे वर्ग जो समान स्तर के होते हैं, एक दूसरे के अधीन नहीं होते ।।
संश्लेषण (Synthesis): विभिन्न भागों व तत्वों को जोड़ना जिससे कि एक समुच्चय का निर्माण हो सके । 9. अभ्यासार्थ प्रश्न 1. ग्रन्थालय वर्गीकरण में अंकन को परिभाषित कीजिए | इसकी आवश्यकता पर प्रकाश
डालिए । 2. वर्गीकरण में अंकन के कार्यों का वर्णन कीजिए । 3. अच्छे अंकन के गुणों का वर्णन करते हुये वर्गीकरण में अंकन के को बताइये ।। 4. 'अंकन वर्गीकरण को बनाता तो नहीं है, अपितु उसे बिगाड़ सकता है । इस कथन को
स्पष्ट कीजिए ।'

5. अंकन कितने प्रकार के होते है? उनके गुणों तथा दोषों का वर्णन कीजिए ।

6. 'स्मरणशीलता' को परिभाषित कीजिए तथा इसके विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए । 10. सन्दर्भ ग्रन्थ 1. Bliss, H.E., organization of knowledge in libraries, 2nd ed., wilson,
N.Y., 1939 2. Dhyani, Pushpa, Library Classification, Ess, New Delhi., 1999 3. Foskett, A.C., Subject Approach to Information, 3rd ed., Clive
Bingley, London., 1977 4. Krishan Kumar, Theory Of Classification, Vikash Publishing House,
New Delhi., 19 5. Ranganathan, S.R., prolegomena to library classification, 3rd ed.,
Sarda Ranganathana Endowment, Bangalore., 1967 6. Sayers, W.C.B., Manual of Classification, 3rd ed., Andre Deutsh:

इकाई-8: पंक्ति एवं श्रृंखला ग्राह्यता (Hospitality In Array And Chain) उद्देश्य

1. इस इकाई के उद्देश्य निम्नलिखित है :2. पंक्ति एवं श्रृंखला की अवधारणा की जानकारी प्रदान करना, 3. पंक्ति एवं श्रृंखला के उपसूत्रों के बारे में बताना, एवं
4. पंक्ति एवं श्रृंखला में ग्राह्यता प्राप्त करने के लिये विभिन्न विधियों का प्रयोग बताना। संरचना / विषय वस्तु
1 विषय प्रवेश 2 पंक्ति एवं श्रृंखला का अर्थ 3 पंक्ति के लिए उपसूत्र
3.1 निःशेषता का उपसूत्र 3.2 | अनन्यता अनुक्रम का उपसूत्र 3.3 सहायक अनुक्रम का उपसूत्र 3.4 समरूप अनुक्रम का उपसूत्र
3.5 पंक्ति में ग्राह्यता 4 श्रृंखला के लिये उपसूत्र
4.1 विस्तार हास का उपसूत्र । 4.2 क्रम सम्बद्धता का उपसूत्र
4.3 श्रृंखला में ग्राहयता 5 सारांश 6 अभ्यासार्थ प्रश्न 7 पारिभाषिक शब्दावली
8 विस्तृत अध्ययनार्थ ग्रन्थसूची। 1 विषय प्रवेश

Thursday, January 3, 2019

7.2 स्वतन्त्रता पश्चात् सार्वजनिक पुस्तकालयों की स्थिति

January 03, 2019 0
7.2 स्वतन्त्रता पश्चात् सार्वजनिक पुस्तकालयों की स्थिति

7.2 स्वतन्त्रता पश्चात् सार्वजनिक पुस्तकालयों की स्थिति

इसके अतिरिक्त कुछ व्यक्तिगत प्रयासों द्वारा स्थापित सार्वजनिक पुस्तकालय थे जिनके उपयोगार्थ भी शुल्क आवश्यक था। इस प्रकार स्वतन्त्रता पूर्व एवं पश्चात् तक पुस्तकालयों का उपयोग समाज के कुछ ऐसे संभ्रान्त व्यक्तियों तक ही सीमित था जो उनके उपयोगार्थ शुल्क दे सकते थे। इन पुस्तकालयों में संग्रहीत अधिकांश पुस्तकें अंग्रेजी भाषा में थी जिन्हें विदेशों से आयात किया था तथा साधारण नागरिकों, नवसाक्षरों एवं बच्चों के उपयोग के लिये उपयुक्त पुस्तकों का सर्वथा अभाव था।
जनसंख्या का अधिकांश हिस्सा अर्थात् 88 प्रतिशत गांवों में निवास करता था, साक्षरता बहुत कम अर्थात् 15 प्रतिशत थी। हिन्दी व अन्य स्थानीय भाषाओं में पुस्तकों का अभाव था। साथ ही तात्कालीन प्रशासन ने न तो इन कमियों को दूर करने का ही प्रयास किया और ना ही सार्वजनिक पुस्तकालयों के विकास को प्रोत्साहित ही किया। इन कारणों से सार्वजनिक पुस्तकालयों की स्थिति शोचनीय रही।

7.2 स्वतन्त्रता पश्चात् सार्वजनिक पुस्तकालयों की स्थिति

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् राष्ट्रीय सरकार से उम्मीद थी कि वह समाज के सभी वर्गों की पठन-पाठन एवं सूचना सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सभी स्तरों पर सार्वजनिक पुस्तकालयों का विकास करेगी। इस सम्बन्ध में कुछ प्रयास भी हुए हैं, जो निम्न प्रकार है - | 1. सन् 1948 में तत्कालीन मद्रास राज्य में देश का सर्वप्रथम पुस्तकालय अधिनियम (Act) बना, जिससे इस राज्य में सभी स्तरों पर सार्वजनिक पुस्तकालयों की स्थापना एवं प्रसार के कार्य का मार्ग प्रशस्त हुआ।
2. राष्ट्र की प्रथम पंचवर्षीय योजना 1951-56 में "पुस्तकालय सेवा सुधार" कार्यक्रम को सम्मिलित किया गया। जिससे सम्पूर्ण राष्ट्र में पुस्तकालयों का जाल बिछाने पर विचार किया गया। इस योजनानुसार सभी राज्यों में राज्य केन्द्रीय पुस्तकालय तथा जिला स्तर पर जिला पुस्तकालयों की स्थापना के लिये केन्द्रीय सरकार द्वारा राज्य सरकारों को आर्थिक सहायता प्रदान की गयी। कई राज्यों ने इस योजना का लाभ भी उठाया।

"पुस्तकालय सेवा सुधार" कार्यक्रम

| इस अवधि में सन् 1956 में तात्कालीन हैदराबाद राज्य में पुस्तकालय अधिनियम पारित हुआ जिससे इस राज्य में सार्वजनिक पुस्तकालय विकास की और अग्रसर हुए। आन्ध्रप्रदेश बन जाने पर सन् 1960 में आन्ध्र प्रदेश सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम का निर्माण हुआ।
3. द्वितीय पंचवर्षीय योजना में भी सार्वजनिक पुस्तकालयों के विकास हेतु यथोचित ध्यान दिये जाने से यह आशा बंधी थी कि सम्पूर्ण राष्ट्र में राज्य केन्द्रीय पुस्तकालयों रख जिला पुस्तकालयों का जाल बिछ जायेगा ओर ये राष्ट्रीय पुस्तकालयों से सम्बद्ध हो जायेंगे।
सन् 1957 में भारत सरकार ने राष्ट्र में सार्वजनिक पुस्तकालयों की स्थिति का सर्वेक्षण कर देश के लिए उपयुक्त 'सार्वजनिक पुस्तकालय तन्त्र" की संरचना के सुझाव के लिए एक परामर्शदात्री समिति (Advisory Committee for Libraries) की स्थापना की जिसके अध्यक्ष डॉ.के.पी सिन्हा थे। इस समिति द्वारा सन् 1957 में अपना प्रतिवेदन तात्कालीन शिक्षा मन्त्री, भारत सरकार को प्रस्तुत कर दिया गया था परन्तु समिति की अनुशंसाओं पर कोई कार्यवाही नहीं की गयी।
4. सन् 1965 एवं 1967 में क्रमश: मैसूर राज्य का सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम एवं महाराष्ट्र सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम पारित हुए। सन् 1979 में पश्चिमी बंगाल सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम बना। वर्तमान में 11 राज्यों में सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम पारित हो चुके हैं- इन राज्यों के नाम है - तमिलनाडु (1948), आंध्रप्रदेश (1960), कर्नाटक (1965), महाराष्ट्र (1967), पश्चिमी बंगाल (1979)ए, केरल (1987), हरियाणा (1987), मणिपुर (1988), मिजोरम (1993), गोवा (1993), एवं गुजरात (2001)।
उपरोक्त प्रयासों के अतिरिक्त भी सभी स्तरों केन्द्रीय, क्षेत्रीय, राज्य, स्थानीय आदि पर कुछ प्रयास किये गये। परन्तु पूरे राष्ट्र में सार्वजनिक पुस्तकालयों का समुचित विकास निम्न कारणों से संभव न हो सका।

7.3 समस्यायें | (i) साक्षरता का अभाव: 

पश्चिमी देशों में प्रजातन्त्र औद्योगिक क्रान्ति, समाज शिक्षा एव सर्वतोन्मुखी शिक्षा (Universal Education) का परिणाम था, परन्तु भारत के प्रजातन्त्र की नींव बहुत बड़े निरक्षर समुदाय पर रखी गयी जो सार्वजनिक पुस्तकालय की उपयोगिता को न तो समझ सकते थे और न ही सराह सकते थे। अत: प्रजातन्त्र का समाजीकरण सार्वजनिक पुस्तकालय द्वारा पोषित सर्वतोन्मुखी शिक्षा (Universal Education) के माध्यम से होना ही राष्ट्र हित में है। देश में शिक्षा का प्रतिशत पिछले चार दशकों में 15% से बढ़कर 36% अवश्य हो गया है परन्तु जिस तीव्र गति से जनसंख्या में वृद्धि हो रही है उसके कारण निरक्षरों की संख्या में भी असीमित वृद्धि हो गयी है।
प्रजातन्त्र में बहुमत की आकांक्षाएं सर्वोपरि होती हैं। अत: उस देश में जहां शैक्षणिक पिछड़ापन है व अधिकांश जन समुदाय निरक्षरता के अंधकार में लिप्त है, वहाँ सार्वजनिक पुस्तकालयों के विकास की मांग का प्रश्न ही नहीं उठता। इसलिए साक्षरता का अभाव सार्वजनिक पुस्तकालयों के विकास में बाधक है।

(ii) आर्थिक विषमताएँ (असमानता) (Inadequate Financing): 

भारत सरकार द्वारा नियुक्त पुस्तकालय परार्मशदात्री समिति (Advisory Committee for Libraries) ने अपने प्रतिवेदन में लिखा है कि भारत में पुस्तकालय सेवा पर प्रति पाँच व्यक्ति एक आना (नये छ: पैसे) प्रतिवर्ष व्यय किया जाता है, जबकि इंग्लैण्ड व अमेरिका में इसी कार्य पर क्रमश: रु. 3.50 व रु. 4.55 प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष खर्च किया जाता है। इससे स्थिति स्पष्ट है कि ऐसी आर्थिक विषमता में भारत में सार्वजनिक पुस्तकालयों का विकास कैसे सम्भव हो सकता है।
योजना आयोग द्वारा नियुक्त पुस्तकालयों हेतु कार्यकारी समूह (Working Group on Libraries) ने 1965 में प्रकाशित अपने सर्वेक्षण में स्पष्ट किया है कि भारत में होने वाला व्यय अमेरिका एवं इंग्लैण्ड की अपेक्षा बहुत कम है और राष्ट्रीय आय की तुलना में जितना व्यय इस मद पर किया जाना चाहिए उतना भी नहीं किया जा रहा है। यही कारण है। कि यहाँ प्रति व्यक्ति पुस्तकों की संख्या व अध्ययन की अभिरुचि कम है जो पुस्तकालयों के विकास के लिए आवश्यक है।
पुस्तकालयों के प्रभावी विकास के लिए सुदृढ़ एवं सुनिश्चित अर्थ व्यवस्था आवश्यक है। परन्तु भारत में पुस्तकालयों के विकास हेतु सुनिश्चित आर्थिक सहायता केवल उन्हीं राज्यों में उपलब्ध है जिनमें पुस्तकालय अधिनियम पारित हो चुके है। शेष राज्यों में धनाभाव सार्वजनिक पुस्तकालयों के विकास में बाधक है। |

(iii) अध्ययन अभिरुचि हेतु अभिप्रेरणा का अभाव (Lack of Motivation for Reading)

 भारत में अधिकांश जनसंख्या गरीबी, निरक्षरता अज्ञानता एवं रूढ़िवादिता के शिकंजे में जकड़ी हुयी है। सामाजिक जीवन पारम्परिक एवं शिथिल है जिसमें नवीन चुनौतियों का अभाव है। ऐसी स्थिति में अध्ययन हेतु प्रेरणा का अभाव स्वाभाविक है। इसके विपरीत पश्चिमी विकसित देशों में जीवन औद्योगिक क्रान्ति एवं आधुनिकीकरण के प्रभाव से अपारम्परिक एवं गतिशील है। जिसके कारण समाज के अधिकांश व्यक्तियों को नित्य प्रति नवीन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।